चाहना कभी रहा शौक पर अक्सर था स्वभाव भी,
जिसमें पूरी हुईं ज़रूरतें पर रहा कुछ अभाव भी,
कायल रहे सुंदरता के, क्षणिक हो या कालांतर,
रही चाहत में कभी तृष्णा, कभी रहा कुछ भाव भी;
घुटनों के बल चलती नन्ही अवस्था को चाहा,
लड़कपन के पैरों में उलझी थिरकता को चाहा,
चाहा हमने यौवन के घुंघराले सपनों को,
रोज़ घटती बढ़ती इस जीवन व्यवस्था को चाहा;
चाहा ग्रीष्म रातों में पूरब से बहती शीतलता को,
चाहा सर्द दुपहरी में महुए की गिरती मादकता को,
ठिठुरन के उपरान्त बासंती छुवन को भी चाहा,
चाहा घटाओं से उमड़ती बूंदो की चंचलता को;
पर चाहतें रहे चारदीवारी में , ऐसा कब, कहाँ चाहा,
चाहा था सब जो मिला, न मिला, सारा जहां चाहा,
यूँ हरदम बदलते थे मौसम, पर क्यूँ ये फ़ितरत बदली,
जब से चाहा है तुम्हें, हमने फिर कुछ नहीं चाहा;
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