Thursday, April 30, 2020

आज लॉक डाउन को सैंतीस दिन हो चले हैं। न तो दिन ही थम रहे हैं, न ही कोरोना । आशंकाओं और आशाओं के बीच सहजता रख पाना जटिल कार्य है।  आज दिन भर मन विचलित सा रहा; न जाने ऐसा क्यों लग रहा है कि सामान्य के मायने बदल गए हैं। दूध की थैलियां अब डिटेर्जेंट पाउडर से होकर गुज़रती हैं, उनके उबाल में अब पहले जैसा क्रोध नहीं दिखता। बर्तन भी अब मँजने के समय सिसकारी नहीं लेते।  गिनती के कपड़े स्वयं ही धूल जाते हैं जैसे समर्पण कर दिया हो।  रुक रुक कर दिन भर लैपटॉप पर चलती उँगलियों से साबुन की महक नहीं जाती।  कितने ही व्हाट्सएप्प पर वीडियो बिना देखे गए ही  वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं।  गमलों के पौधों को रोज़ पानी मिलता है और उनकी साँस किसी वेंटीलेटर की मोहताज़ नहीं रहती। न कोई हमसे मिलता है न हम किसी से; मोहल्ले की खामोशियाँ भी चीख चीख कर खामोश हो गयी हैं।  रोज़ एक दिन ढल जाता है और अगला दिन उगता नहीं।  जिस दुनिया में जी रहे थे वह अतीत हो चली है।

दो दिन में दो फ़िल्मी अभिनेता गुज़र गए , कोरोना से नहीं, कैंसर से।  जैसे सन्देश दे रहे हों कि  कोरोना ही सब कुछ नहीं ; पहले वाले अब भी हैं। पता नहीं कि ये कहर इन्सानी है या कुदरती पर इसने इज़ाफ़ा किया है आस्तिक लोगों की संख्या में। पता नहीं कितने ही लोग यह सोच रहे हैं कि ज़िंदगी वह नहीं थी जो वह जीते आये थे ; ज़िंदगी तो वह होगी जो वो अब जीयेंगे। हमारी सोच भी नए नए वायरस के साथ बदलती रहती है। लेकिन शाम का अधखिला चाँद अब भी कपड़े नहीं पहनता । न ही गिलहरी अखरोट की तलाश छोड़ देती है ; पक्षी निर्भीकता से अपना आकाश नापते हैं; कुछ जानवरों के जंगल की सीमाएं बढ़ गयी हैं। एक बस इन्सान है जो किसी दायरे में इसलिए है क्यूंकि उसपर भय का साया है, कुछ सोचा हुआ भय और कुछ थोपा हुआ।  मुझे नहीं पता की यह वर्तमान भविष्य को कितना प्रभावित करेगा ; नहीं पता कि यह भय कब तक भय रहेगा। पर कुछ तो ऐसा हो रहा है जो स्वाभाविक इंसानी प्रकृति नहीं; कुछ तो ऐसा हो रहा है जो प्राकृतिक प्रकृति भी नहीं; कुछ तो ऐसा हो रहा है जो सिर्फ कोरोना वायरस नहीं। 

Wednesday, April 29, 2020

ऐसी कौन सी जगह है जहाँ बस लोग भले जाते हैं,
हर तहरीर से पहले ही वहां कुछ मनचले जाते हैं।

किसी अलग धुन में रहते हैं, वे शिकायत नहीं करते,
पर अपनी ही अच्छाइयों से अमूमन छले जाते हैं।

किसी ने बुझा दी थी जो कितने ही बरस पहले,
हम हैं कि आज भी उसी आग में जले जाते हैं।

यूँ जीने के लिहाज़ से ज़िंदगी बड़ी है उनकी,
पर अच्छे लोग अक्सर जल्दी चले जाते हैं।

Saturday, April 25, 2020

खोज रहे थे अरसे से हम, पर तुम कहाँ हुई थी गुम,
या हम देख नहीं पाते थे, रहते थे खुद से गुमसुम,
आज अचानक भेंट हो गई तो ऐसा क्यों  लगता है,
जितना तब से बिखरें हैं हम, उतना निखर गई हो तुम ।

Friday, April 24, 2020

सुन्दर से वो दिखते हैं, हम जतन से उनको रखते हैं,
जो अंदर दिखता है, सच है, नहीं वो झूठा कहते हैं,
खटपट में लेकिन तुम उनको क्यों कुछ नहीं समझते हो,
इसीलिए तो काँच के बरतन अक्सर टूटा करते हैं।

Thursday, April 23, 2020

कभी सोचा न था......
कि घर के वो कोने जो छिपे थे चुपचाप,
वो भी अब अक्सर करेंगे हमसे बात,
सोचा न था कि होगी साझेदारी सूरज चाँद की,
और एक से ही हो जाएँगे ये दिन और रात।

कभी सोचा न था......
कि झेल पाएंगे बरतनों को अपनी ओर तकते,
और देख पाएँगे गमलों में पौधों को रोज़ बढ़ते,
सोचा न था की नापेंगे आसानी से उतार चढ़ाव,
और गुज़र जाएगा समय सीढ़ियाँ उतरते चढ़ते।

कभी सोचा न था......
कि नहीं करेंगे कपड़े आपस में कोई कलह,
और रहेंगे गाड़ी के पहिये स्थिर अपनी जगह,
सोचा न था कि कैसे रहेंगे ये स्वभाव के विपरीत,
और फिर भी न पूछेंगे अपनी स्थिरता की वज़ह।

कभी सोचा न था......
कि आलिंगन के माने भी छह फ़ीट दुरी होगी,
और अपनों से दुरी भी उतनी ही ज़रूरी होगी,
सोचा न था कि हाथ धोने को बस साबुन काफी होंगे,
और मुखौटों पर भी मास्क चढ़ाना मज़बूरी होगी।