आज लॉक डाउन को सैंतीस दिन हो चले हैं। न तो दिन ही थम रहे हैं, न ही कोरोना । आशंकाओं और आशाओं के बीच सहजता रख पाना जटिल कार्य है। आज दिन भर मन विचलित सा रहा; न जाने ऐसा क्यों लग रहा है कि सामान्य के मायने बदल गए हैं। दूध की थैलियां अब डिटेर्जेंट पाउडर से होकर गुज़रती हैं, उनके उबाल में अब पहले जैसा क्रोध नहीं दिखता। बर्तन भी अब मँजने के समय सिसकारी नहीं लेते। गिनती के कपड़े स्वयं ही धूल जाते हैं जैसे समर्पण कर दिया हो। रुक रुक कर दिन भर लैपटॉप पर चलती उँगलियों से साबुन की महक नहीं जाती। कितने ही व्हाट्सएप्प पर वीडियो बिना देखे गए ही वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। गमलों के पौधों को रोज़ पानी मिलता है और उनकी साँस किसी वेंटीलेटर की मोहताज़ नहीं रहती। न कोई हमसे मिलता है न हम किसी से; मोहल्ले की खामोशियाँ भी चीख चीख कर खामोश हो गयी हैं। रोज़ एक दिन ढल जाता है और अगला दिन उगता नहीं। जिस दुनिया में जी रहे थे वह अतीत हो चली है।
दो दिन में दो फ़िल्मी अभिनेता गुज़र गए , कोरोना से नहीं, कैंसर से। जैसे सन्देश दे रहे हों कि कोरोना ही सब कुछ नहीं ; पहले वाले अब भी हैं। पता नहीं कि ये कहर इन्सानी है या कुदरती पर इसने इज़ाफ़ा किया है आस्तिक लोगों की संख्या में। पता नहीं कितने ही लोग यह सोच रहे हैं कि ज़िंदगी वह नहीं थी जो वह जीते आये थे ; ज़िंदगी तो वह होगी जो वो अब जीयेंगे। हमारी सोच भी नए नए वायरस के साथ बदलती रहती है। लेकिन शाम का अधखिला चाँद अब भी कपड़े नहीं पहनता । न ही गिलहरी अखरोट की तलाश छोड़ देती है ; पक्षी निर्भीकता से अपना आकाश नापते हैं; कुछ जानवरों के जंगल की सीमाएं बढ़ गयी हैं। एक बस इन्सान है जो किसी दायरे में इसलिए है क्यूंकि उसपर भय का साया है, कुछ सोचा हुआ भय और कुछ थोपा हुआ। मुझे नहीं पता की यह वर्तमान भविष्य को कितना प्रभावित करेगा ; नहीं पता कि यह भय कब तक भय रहेगा। पर कुछ तो ऐसा हो रहा है जो स्वाभाविक इंसानी प्रकृति नहीं; कुछ तो ऐसा हो रहा है जो प्राकृतिक प्रकृति भी नहीं; कुछ तो ऐसा हो रहा है जो सिर्फ कोरोना वायरस नहीं।
