कभी सोचा न था......
कि घर के वो कोने जो छिपे थे चुपचाप,
वो भी अब अक्सर करेंगे हमसे बात,
सोचा न था कि होगी साझेदारी सूरज चाँद की,
और एक से ही हो जाएँगे ये दिन और रात।
कभी सोचा न था......
कि झेल पाएंगे बरतनों को अपनी ओर तकते,
और देख पाएँगे गमलों में पौधों को रोज़ बढ़ते,
सोचा न था की नापेंगे आसानी से उतार चढ़ाव,
और गुज़र जाएगा समय सीढ़ियाँ उतरते चढ़ते।
कभी सोचा न था......
कि नहीं करेंगे कपड़े आपस में कोई कलह,
और रहेंगे गाड़ी के पहिये स्थिर अपनी जगह,
सोचा न था कि कैसे रहेंगे ये स्वभाव के विपरीत,
और फिर भी न पूछेंगे अपनी स्थिरता की वज़ह।
कभी सोचा न था......
कि आलिंगन के माने भी छह फ़ीट दुरी होगी,
और अपनों से दुरी भी उतनी ही ज़रूरी होगी,
सोचा न था कि हाथ धोने को बस साबुन काफी होंगे,
और मुखौटों पर भी मास्क चढ़ाना मज़बूरी होगी।
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