Monday, March 30, 2020

क्या याद है तुम्हे,
निगल गए थे तुम,
कितने ही जंगल,
और हरी छाती धरती की,
ईंट, रेत और सीमेंट से,
होती रही भूरी,
पर तुम्हे क्या,
तुम्हारी तो भरती रही,
तिजोरी।

क्या याद है तुम्हे,
तुम्हारा मोड़ देना नदियों को,
या रोक लेना उनका पानी,
और खड़े कर देना,
इनके इर्द गिर्द,
होटल, रिसोर्ट और न जाने क्या क्या,
याद है क्या,
कि आते थे जहाँ,
बगुले, हिरण, हाथियों के झुण्ड,
किन्ही प्यास का,
निवारण था यहाँ।

क्या याद है तुम्हे,
कैसे काली कर दी है,
ये साफ़ निश्छल अविरल हवा,
आसमानी चिमनियों ने,
और सड़कों पर उगलते,
तुम्हारी मशीनों के धुंए ने,
कैसे मिट गयी हैं,
वो सरल पगडंडियाँ अभी,
जिन्हें करते थे उजागर,
रास्तों के जुगनू कभी। 

कैसे याद होगा,
तुम्हारी तो फितरत रही है,
कर लेना कब्ज़ा,
किराये का आशियाना,
कैसे याद होगा,
तुम्हे तो बस आता है,
एक मशीन और बनाना,
तुम्हारा उद्देश्य है,
दिल को और बहलाना,
चाहे रोज़ लुटता रहे,
प्रकृति का अनमोल खज़ाना।

तो लगता है अब जैसे,
सुदर्शन चक्र की है बारी,
सहन कर चुके हैं गलतियाँ,
शिशुपाल की, कृष्ण मुरारी,
फिर भी शायद दे रहे हैं,
आखिरी मौका एक,
संभल जाओ अपने घरों में ही,
तुम, मैं..... प्रत्येक
माना की आदत नहीं है,
और ये नियम थोड़ा सख्त है,
पर दोस्त, पालन करो,
ये क़र्ज़ अदायगी का वक़्त है।









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