रिश्तों के एहसास का बेबस बुढ़ापा, रास्तों को नापने में खो गया है;
रात का रिसता हुआ सूखा अँधेरा, भोर होते पसलियों में सो गया है;
बेख़ौफ़ चलते इस जगत के जाल में, अब हमारा ध्यान कैसे रम गया है;
अपनों की उन सूनी आँखों में तो देखो, दर्द है जो गर्मियों में जम गया है I
रात का रिसता हुआ सूखा अँधेरा, भोर होते पसलियों में सो गया है;
बेख़ौफ़ चलते इस जगत के जाल में, अब हमारा ध्यान कैसे रम गया है;
अपनों की उन सूनी आँखों में तो देखो, दर्द है जो गर्मियों में जम गया है I
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