Friday, February 14, 2014

a translation

I thought of brooming the stars,
Picking the Moon and letting it rest against the wall of the sky,
To make space for love.
Also, I wanted to rake the trees, level the mountains,
...Soak the oceans and mop the rivers,
To make space for love.
On second thoughts,
I let them be,
To camouflage
You and me.
By- Manji Kaur Handa
My Translation
सोचता था कि सितारों, पर ज़मीं को साफ़ करके,
और चंदा को टिकाकर, मैं गगन के आसरे से,
कुछ चमन खाली बनाऊं, प्रेम कि अभिव्यक्ति खातिर.

चाहता था खोद डालूं , वृक्ष के भूतल किनारे,
कर दूँ समतल इस धरा के, मस्त से परबत ये सारे,
सोख कर सारा समंदर, और नदियों की रवानी,
कुछ धरा खाली सजाऊं, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.

किन्तु चंदा और तारे, वृक्ष औ पर्वत हमारे,
सारी नदियाँ सागर सारे, ये दिशायें ये किनारे,
घोल लेते हैं हमें, हैं प्रेम की अभिव्यक्ति सारे.

ये नहीं तो क्या गगन है, ये नहीं तो क्या चमन है,
प्रेम की तो ढाल हैं ये, प्रेम का इनसे सृजन है,
आओ इनको हम बचाएँ, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.
पूरब की बयारों में,
जो अरमां उड़ा करते थे,
बड़े खामोश से,
सहमे से बैठे हैं,
कहीं कुछ
थम गया है शायद....

मचलती गर्मियों में,
दिल- ए -शरबते,
बरफ की सिल्लियों पर,
चुपचाप जलते हैं,
कहीं कुछ,
जम गया है शायद....

गुज़रती रातों में,
जो जुगनू थे रौशन,
अंधेरों में वो अपनी,
राहें ढूंढते हैं,
कहीं कुछ,
जल गया है शायद....

हताशाओं के मंज़र पर,
जो हिम्मत मुस्कुराती थी,
विवशताओं में अपनी वो,
निशानी खोजती है,
कहीं कुछ,
मर गया है शायद....



सब ने कहा सच्चे इरादों में दम होता है,
पर मुरादें सब हों पूरी, ऐसा कम होता है,
हौसला अफजाई कि बात और है'नीरज',
अक्सर घरों में एक कमरा कम होता है...
------------------------------------------------------

हुजूर कहते हैं कि पाजिटिव लिखो,
कैसे समझाएं उन्हें,
एक और कमरे कि चाहत भी पाजिटिव है,
जिंदगी से समझौते कि आदत भी पाजिटिव है,
शब्दों के अर्थ हम बेशक अपने निकालें,
चाहतों कि चाहत भी पाजिटिव है....
------------------------------------------------------

परिवर्तनशील जिंदगी

कमरे में  कुर्सियों की पहचान बदल जाती है,
दूधवाले भैया की मुस्कान बदल जाती है,
चिड़ियों के सुरों की तान बदल जाती है,
रोज़मर्रा के चीज़ों की दुकान बदल जाती है,

बदल जाती है सरसराहट नल के आने की,
बदल जाती आवाज़ दरवाज़ा खटखटाने की,
बदल जाती जगह अखबार को पाने की,
बदल जाती है खिड़की रोशनी अन्दर आने की,

घर खुला रखने की परेशानी बदल जाती है,
किसी के घर में होने की निशानी बदल जाती है,
महज़ एक मकान बदल लेने से,
हमारी कितनी जिंदगानी बदल जाती है,

दोस्तों, यूँ तो बदलाव की अपनी मीठी थकान है,
पर हमारा जीवन भी एक किराए का मकान है,
ठहराव है, बदलाव है, रोज़ नया आयाम है,
परिवर्तनशील जिंदगी, तुझे मेरा सलाम है.
वीरान रातों में दिये नहीं टिमटिमाते,
जुगनू अब जैसे दिन में निकलते हैं,
सोचा था कभी तो तन्हा होऊंगा पर,
ये सन्नाटे हमशक्ल से, साथ चलते हैं.....
ज़रा सा छेड़ दो तो ये कहाँ चुपचाप सहती हैं,
ज़रा बिखरी, ज़रा जिद्दी, ज़रा मशरूफ़ रहती हैं,
कसक हैं ये मियादों की, ये इक मुद्दत की यादें हैं,
मेरे दिल के घरोंदों में बड़ी महफूज़ रहती हैं,
इस जाड़े के शाम की सहमी धूप अब गुज़र जाना चाहती है I गार्डेन पाम के वृक्ष सीधे खड़े हैं;  बिलकुल मौन जैसे निस्तब्धता को सार्थक कर रहे हों I बिजली के तारों पर बैठी चिड़ियाँ न जाने क्या आने या जाने की प्रतीक्षा कर रही हैं I लान में जबरन फैलाई गई हरी घास ओस से मिलन की आस में रात की बाट जोह रही हैं I अहाते की फेंसिंग पर लगे नारंगी फूल अब भी नारंगी ही दिखते हैं I बरगद की झूलती जडें धरती से चार फीट ऊपर ही रहती हैं I सब कुछ तो रोज़ की तरह ही है; बस एक और दिवस है जो भाग जाना चाहता है I मुझसे, तुझसे, हम सब से दूर.....कहीं और उजाला होगा; कहीं और कुछ हसरतें खुमारी आँखों में जगेंगी; कुछ रेशमी सी किरणें कहीं बर्फ पर पड़कर चांदी सी चमकेंगी; कहीं और दुनिया सजेगी; कहीं और जिंदगी चलेगी....
देख कर मंज़र ये ऐसा क्यों लगा,
मन भरा पर आँख बाकी रह गयी,
देर से पहुंचा सवेरा आज क्यों,
रात की कुछ बात बाकी रह गयी,

पहले आती नहीं थी, अब खुलती नहीं है,
नींद भी मेरी किस्मत की तरह हो गयी है।
कुछ यादों का बिछौना भी बना लेना,
महज़ लिहाफ़ों में ये सर्द रात कटे  .... न कटे,
किसी कि फ़िक्र हो शायद किसी का ज़िक्र हो शायद,
सूरज ओढ़ कर सोना, ये कोहरा छंटे  .... न छंटे।
तेरा रुतबा है तो मेरा भी ईमान है ,
तेरे सितम से जूझना मेरा गुमान है,
सबने सोचा था बिखर जाऊँगा इन थपेड़ों से पर,
मेरी मौज़ूदगी ही आज मेरी पहचान है।

Thursday, February 13, 2014



खुद का गम साझा न कर मुझपर मेहरबान है,
मेरा मददगार देखो कैसा बेईमान है।

कुछ हम करें इकठ्ठा,
कुछ तुम बिन लाओ,
मचियों पर बैठें चरों ओर,
और अलाव जलाओ,
कुछ तापो कुछ कहो,
कुछ सुनो कुछ धुआँ भगाओ,
आलू शकरकंद भूनो,
फिर मिलकर खाओ,
मर्ज़ी है दुबका रजाई में,
या इस जाड़े को उत्सव बनाओ।

सुबह से सूरज नदारद,
दिन भर सर्द हवाएँ,
फिर शाम को बारिश,
दिल लगाएँ या दर्द बचाएँ ?
सुबह आशा  … शाम उदासी क्या ;
धूप तो धूप है  .... ताज़ा और बासी क्या।
न ही कोई निराशा है न ही कोई मज़बूरी है ;
पर दोस्त … सितारों को देखने के लिए,
थोड़ा अँधेरा ज़रूरी है।
अब इलाहाबाद पहले जैसा नहीं लगता। पर सब कुछ तो वही है … वही सडकों के किनारे खुदे गड्ढे, वही धुआँ उगलती गाड़ियां, वही गलियों में भरा टूटी पाइपों का पानी, वही ज़िद्दी जाड़ा, वही अनमना सूरज, वही फूल सी झड़ती गालियाँ .... सब कुछ तो वही है। यह एहसास पहले कभी नहीं हुआ कि कोई जगह मात्र इसलिए बदल सकती है क्योंकि हमारे वहाँ आने का कारण भिन्न है।
कोहरा अब छँटता है तब भी रह जाता है; धूप आकर भी नहीं आती है; रात जगते जगते सोती है; दिन काट काट कर कटता है; बिजली का आना जाना मायने नहीं रखता; इन्वर्टर कि बैटरी सांस लेते लेते दम तोड़ देती है … साल भर पहले बाथरूम में औंधी रक्खी बाल्टी अब भी औंधी ही पड़ी है; जब कष्ट आता है तो वक़्त थम जाता है।
आँखों में जब दर्द रिस आता है तो लहू भी थम जाता है; अस्पताल और घर के बीच की दूरी कभी इतनी याद नहीं थी; आज इतवार है शायद .... पर उससे क्या .... कोई शिकायत कि अर्ज़ी थोड़े ही लगानी है; ईश्वर का अपना फैसला है … कहते हैं वह बड़ा ऑटोक्रेटिक है।
कितने ही रंज तूने राह में बिछाये हैं,
दो पल के बीच दिए कैसे स्याह साये हैं,
तेरी बारीकियाँ तो तू ही जानता है मगर,
हम भी ज़िद्दी हैं चलने के लिए आये हैं,

मीलो मील पड़े चलना तो ज्यादा क्या है,
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है …।
पथरा गई हैं राह की वीरानियों में,
बुझ गई हैं उम्र की कुर्बानियों में,
झिलमिलाकर चुलबुली सी हो गई हैं,
देख कर तुमको कहीं नादानियों में;

आँख से उपजा सजल औज़ार क्या है;
क्यूँ तुम अब भी पूछते हो प्यार क्या है …?