Friday, February 14, 2014

पूरब की बयारों में,
जो अरमां उड़ा करते थे,
बड़े खामोश से,
सहमे से बैठे हैं,
कहीं कुछ
थम गया है शायद....

मचलती गर्मियों में,
दिल- ए -शरबते,
बरफ की सिल्लियों पर,
चुपचाप जलते हैं,
कहीं कुछ,
जम गया है शायद....

गुज़रती रातों में,
जो जुगनू थे रौशन,
अंधेरों में वो अपनी,
राहें ढूंढते हैं,
कहीं कुछ,
जल गया है शायद....

हताशाओं के मंज़र पर,
जो हिम्मत मुस्कुराती थी,
विवशताओं में अपनी वो,
निशानी खोजती है,
कहीं कुछ,
मर गया है शायद....



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