Thursday, February 13, 2014

अब इलाहाबाद पहले जैसा नहीं लगता। पर सब कुछ तो वही है … वही सडकों के किनारे खुदे गड्ढे, वही धुआँ उगलती गाड़ियां, वही गलियों में भरा टूटी पाइपों का पानी, वही ज़िद्दी जाड़ा, वही अनमना सूरज, वही फूल सी झड़ती गालियाँ .... सब कुछ तो वही है। यह एहसास पहले कभी नहीं हुआ कि कोई जगह मात्र इसलिए बदल सकती है क्योंकि हमारे वहाँ आने का कारण भिन्न है।
कोहरा अब छँटता है तब भी रह जाता है; धूप आकर भी नहीं आती है; रात जगते जगते सोती है; दिन काट काट कर कटता है; बिजली का आना जाना मायने नहीं रखता; इन्वर्टर कि बैटरी सांस लेते लेते दम तोड़ देती है … साल भर पहले बाथरूम में औंधी रक्खी बाल्टी अब भी औंधी ही पड़ी है; जब कष्ट आता है तो वक़्त थम जाता है।
आँखों में जब दर्द रिस आता है तो लहू भी थम जाता है; अस्पताल और घर के बीच की दूरी कभी इतनी याद नहीं थी; आज इतवार है शायद .... पर उससे क्या .... कोई शिकायत कि अर्ज़ी थोड़े ही लगानी है; ईश्वर का अपना फैसला है … कहते हैं वह बड़ा ऑटोक्रेटिक है।

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