पथरा गई हैं राह की वीरानियों में,
बुझ गई हैं उम्र की कुर्बानियों में,
झिलमिलाकर चुलबुली सी हो गई हैं,
देख कर तुमको कहीं नादानियों में;
आँख से उपजा सजल औज़ार क्या है;
क्यूँ तुम अब भी पूछते हो प्यार क्या है …?
बुझ गई हैं उम्र की कुर्बानियों में,
झिलमिलाकर चुलबुली सी हो गई हैं,
देख कर तुमको कहीं नादानियों में;
आँख से उपजा सजल औज़ार क्या है;
क्यूँ तुम अब भी पूछते हो प्यार क्या है …?
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