Thursday, February 13, 2014


कुछ हम करें इकठ्ठा,
कुछ तुम बिन लाओ,
मचियों पर बैठें चरों ओर,
और अलाव जलाओ,
कुछ तापो कुछ कहो,
कुछ सुनो कुछ धुआँ भगाओ,
आलू शकरकंद भूनो,
फिर मिलकर खाओ,
मर्ज़ी है दुबका रजाई में,
या इस जाड़े को उत्सव बनाओ।

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