आती है जिन वीर घरों से,आवाज़ें बस सिसकी की,
आज हमारी दीवाली है, कर्ज़दार उस हिचकी की,
छाती पर गोली खाने से,वह प्रहरी जो न सकुचाया,
सीमाओं की रक्षा में,जो पौरुष ज़िंदा लौट न पाया;
हमने हर बीती दीवाली, रौशन रक्खा अपना धाम,
चलो जलाएँ अब की बार,एक दिया उनके भी नाम।