Tuesday, May 16, 2023

 

छुट्टे सिक्कों की जमघट में,
चल निकले हैं खोटे कितने,
देखे हमने इस जीवन में,
बिन पेंदे के लोटे कितने;

रंग रूप में भेद न करते,
गोरा हो काला या भूरा,
इर्द गिर्द हरदम मंडराते,
जब तक स्वार्थ नहीं हो पूरा;

सब को बाप बनाना पड़ता,
चाहे जो हो सत्ताधारी,
ये भी नहीं सभी के बस का,
चमचागिरी काम है भारी;

देखा चमचों की महफ़िल में,
सभी तरह के नर और नारी,
कुछ ढोलक कुछ बीन बजाते,
कुछ करते ओहदे से यारी;

यारी से परहेज़ नहीं है,
सबको ये लगती है प्यारी,
पर जब सीमा लाँघ अचानक,
यारी बन जाती अय्यारी ;

तब विश्वास कहीं कोने में,
आँख बंद सोता रहता है,
लहरों के संग चलते चलते,
कुछ विवेक खोता रहता है;

दुनिया में हैं कई मेनका,
कामुकता का अंत नहीं है,
कहते हो पुरुषत्व जिसे वो,
मानव ही है, संत नहीं है;

एक दिवस तब ऐसा आता,
जब पहले विवेक मर जाता,
कर गरिमा से आँख मिचौली,
भंग तपस्या करके जाता;

लोभ, लालसा, मोह, पिपासा,
सब की अपनी अपनी भाषा,
अब वो है अधिकार मांगती,
जो पहले बस करती आशा;

जहाँ  परिश्रम हिल जाता है,
वहीं उसे सब मिल जाता है,
बिना योग्यता लाँघ सीढ़ियाँ,
चेहरा उसका खिल जाता है;

किन्तु यहाँ कब अंत है होता,
दोष लगा कर देती धोखा,
अंधियारे में कहीं मेनका,
एक दिवस जब भाग्य है सोता,

माना ओहदे की गल्ती है,
माना इच्छा भी पलती है,
वैध अवैध नहीं कुछ माना,
पर गरिमा कितनी सस्ती है;

पता नहीं है, कौन है जीता,
कौन है हारा, पता नहीं है,
टूट गए सपने और अपने,
क्या मर्यादा, पता नहीं है;