Friday, April 26, 2013

दिमागी कसरतों की कारस्तानी छोड़ आया हूँ,
भरोसे नींद के पिछली जवानी छोड़ आया हूँ,
नहीं जब बंद दरवाजों से हाले-दिल मिला कोई,
महज़ एहसास के दम पर निशानी छोड़ आया हूँ ....... :)

Thursday, April 25, 2013

इस सोते कुम्भकरण की नीयत कैसे भला जगाओगी ,
अब डूब चुकी तीनों दुनिया तुम कितना नीर बहाओगी,
इस कलयुग में रक्षा करने कोई घनश्याम न आयेंगे,
अब खुद ही शस्त्र उठा लो नारी या अबला रह जाओगी।
तुमने नवरात के व्रत रक्खे तुमने है कोख का दर्द सहा,
तुम रही प्रताड़ित सदियों से पर नहीं एक भी शब्द कहा,
भस्मासुर यूँ तो दुनिया के आज नहीं कल मरते हैं, 
उद्धार तो लेकिन तब होगा जब तुम दुर्गा बन जाओगी।
बहुत रही जननी भार्या और बहना बेटी बहुत रही,
ताउम्र सही पीड़ा लेकिन पीड़ा फिर भी बेशर्म रही,
अस्तित्व तुम्हारा जग में अब तो तब ही आदर पायेगा,
जब नरमुंड लिए हाथों में तुम काली बन जाओगी।

Tuesday, April 23, 2013

पत्ते अब सूख कर गिरने लगे हैं। हालांकि इस पार्क की ढलान पर असमतल रूप से फैली घास अब भी हरी है। बायीं ओर वही पगडण्डी है जो खुद ही इस ढलान पर अनायास ही उतर जाती है  ; मानो यही उसका स्वभाव है। अभी महीने भर पहले इसी पगडण्डी के दोनों तरफ अनेक रंगों में ढेरों फूल इसका साथ देते थे। अब तो महज़ उन फूलों के पौधों के अवशेष बचे हैं ... शायद कुछ बीज भी हैं जो इस भूरी मिटटी में सांस ले रहे हैं ..प्रतीक्षा में ....एक बसंत जाने को है पर एक और आयेगा ...संयम रखेंगे तो रंग फिर खिलेंगे। यूँ तो इस पगडण्डी पर मेरे पैर रोज़ फिसलते हैं पर कभी कभी मैं इसके दायीं और फैली घास पर बैठ जाता हूँ ...यहाँ से कुछ दूर तक दिखता है। आगे छितरे हुए छोटे छोटे बबूल के पेड़ ...ढलान जहाँ ख़त्म होती है वहां निर्मित बड़ा पानी का फव्वारा जिसमे पानी बस बारिशों में जमा होता है ; फिर कुछ और पेड़ ; हवा में टंगा हुआ सा नेहरु प्लेस मेट्रो स्टेशन और उसके पीछे ऊँची इमारतें जिनमे रोज लोग ऑफिस की कुर्सियाँ तोड़ते हैं ...और सिमटे रहते हैं लैपटॉप के बस्तों में। उन इमारतों के नीचे एक बाज़ार लगता है जो सुबह बनता है और शाम को उजड़ जाता है। जहाँ लोग तख्तों पर रखकर सामान बेचते हैं और शाम को उसे बरसाती और रस्सियों के सहारे दफ़न कर देते हैं ; एक रात के लिए। अगले दिन फिर उसे जिंदा करते हैं और साथ ही जिंदा रहते हैं कई चूल्हे जो कहीं इन बरसातियों के अन्दर सांस लेते हैं। खैर, वह बाज़ार यहाँ से नहीं दिखता पर यदि आप वहां गए हैं तो उसे यहाँ से महसूस कर पाना मुश्किल नहीं है। यह सब कुछ कितना सरल होते हुए भी कुछ अजीब है क्योंकि यहाँ तो मैं अकेला घास पर बैठा एक ठहरी दुनिया देख रहा हूँ पर वहां वही दुनिया भाग रही है। या शायद मैं वही देख रहा हूँ जो देखना चाहता हूँ। 

यह पगडण्डीनुमा रास्ता ही मेरे कौतूहल का विषय है। कुछ देर यहाँ घास पर बैठकर लोगों को आते जाते देखना, उनके हाव भाव पढ़ना, मनोस्थिति समझना और फिर स्वयं पर ही हँसना .....कि कैसे आदमी हो; ये दिल्ली है और यहाँ पर व्यक्ति को स्वयं अपने विषय में सोचने की फुर्सत नहीं और एक तुम हो कि इसे अपना टाइमपास बना रहे हो ! नेहरु प्लेस से आता हुआ व्यक्ति इस रास्ते को हांफ कर चढ़ता है हालाँकि चढ़ाई कोई विशेष नहीं है पर धन्य है हमारा आज का खान पान और रहने के तौर तरीके की तनिक सी चढ़ाई खटक जाती है। मज़े की बात है की ढलान पर उतरने वाला व्यक्ति भी बहुत संभल कर उतरता है कि संतुलन बना रहे। जितना समय इस ढलान पर उतरने में लगता है उसका दोगुना चढ़ने में। कुछ कुछ जिंदगी की तरह; जैसे धीरे धीरे हौसले के साथ ऊपर चढ़ता व्यक्ति गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते हांफ जाता है और फिर जब समय उसे नीचे धकेलता है तो काफी सम्भालने की कोशिशों के बावजूद व्यक्ति दोगुनी रफ़्तार से नीचे चला जाता है। इस रास्ते पर सब तरह के लोग दिखते हैं; वह बूढी औरत जो चलते चलते बार बार रुक कर सांस भरती है; वह अधेड़ आदमी जिसे ऑफिस का बैग इस रास्ते पर बोझ लगता है, वह जवान जोड़ा जिसने आपस में हाथों को जकड़ रखा है ताकि न तो गिरें और न ही साथ छूटे ; ये अलग बात है कि जिंदगी के इन रास्तों पर उनमे से चंद ही साथ दे पायेंगे। इकहरे बदन का वह लड़का जिसे अपने मोबाइल फोन के प्यार के आगे इन रास्तों का आभास भी नहीं होता; वह लड़की, संभल कर चलती हुई क्योंकि ऊँची हील से ही उसका कद कद लगता है; या वे बच्चे जिन्हें ये रास्ता महज़ खेल लगता है। मैं बैठा हुआ चुपचाप इस ठहरे हुए रास्ते पर चलते हुए जीवन को देखता हूँ।

Sunday, April 21, 2013

कभी दिलवालों की रही, अब दरिंदों की है,
क्यों तेरे इस शहर में भूचाल नहीं आता,
वाह री लेखनी तेरी रोशनाई में,
लिखने के लिए अब ख़याल नहीं आता,
यूँ ही गुज़र जायेगी रही-सही 'नीरज',
अब किसी के लहू में उबाल नहीं आता।

Monday, April 15, 2013

अरसे बाद बात हुई,
न उसने पहचाना,
न हमने बताया,
कुछ देर तक सिलसिला,
यूँ ही चला,
फिर बताना पड़ा,
हूँ वही सिरफिरा,
आभारी हूँ,
कुछ ऐसे लोगों का भी,
जो आज बस आभास हैं,
पर किन्ही दिनों के,
बेहद ख़ास हैं,
जो बीती हवाओं के झूले पर,
झूलते नहीं,
याद नहीं रख पाते,
पर भूलते नहीं ...
सुबह सुबह अनजाना सा एहसास,
पलकों से ख़ुमारी हटाता है,
जबकि मैं मेरे साथ ही रहता हूँ तो,
मेरा दरवाज़ा कौन खटखटाता है,

Sunday, April 14, 2013

यूँ तो गुज़री साँसों का कुछ पल अब तक खलता है,
पर बेढंगी उम्मीदों में भी एक परिंदा पलता है,
कब तक 'नीरज' बीती घड़ियों में जिंदा रह पाओगे,
कुछ ज़ख्मों के साथ सही जीवन तो आगे चलता है ..

Saturday, April 13, 2013

अब ....... जब,
बूढ़े बरगद में गूलर नहीं लगती,
और चौपाल की सीमेंट उधड़ गयी है,
कल्लू के दुआरे का इनारा सूख गया है,
और बौरों का अम्बियों से मन रूठ गया है,
अब ........ जब,
साइकिल पर मलाईवाला नहीं आता,
और यहाँ कोई सोहर नहीं गाता,
कुंजड़े को मरे सात बरस हुए,
कोई यहाँ चूड़ी नहीं लाता ,
अब…. ....जब,
एक अरसा गुज़र गया,
और अंखियन से मन भर गया,
तुम क्या बतलाने आये हो,
किसकी सुध लेने आये हो…. 

Wednesday, April 10, 2013

हर टीस को जबरन जताने की ज़रूरत क्या है,
नमी सहेज, खुद को सताने की ज़रूरत क्या है,
जो समझते नहीं, उन्हें बता कर क्या हासिल होगा,
जो समझते हैं, उन्हें बताने की ज़रूरत क्या है  .....

Friday, April 5, 2013

अब नहीं जुड़ पाते हैं अरमां घरोंदे की खातिर,
तबीयत खर्चों की बेहिसाब रहती है मुझसे,

जिंदगी की गुफ्तगू में हम भी शामिल हैं मगर,
लफ्ज़ की अदायगी चुपचाप रहती है मुझसे,

अब नहीं दिख पाते हैं चेहरे मेरी अलमारियों में,
कोई नामौजूदगी आसपास रहती है मुझसे,
तेरे गिले शिकवों का दौर शायद कुछ लम्बा चले,
फुर्सत इन दिनों नाराज़ रहती है मुझसे ...