Tuesday, June 27, 2023

 

मात्र एक अनुमति मांगी, इंकार कहाँ माँगा था,
हमने बस सपना माँगा, दीदार कहाँ माँगा था;

पूछे हैं सूखी आँखें टकटकी लगाए, राहों पर,
हमने बस अपना माँगा, संसार कहाँ माँगा था;

दरिया से कुछ दूर बसी जर्जर दीवारें कहती है,
हमने बस पानी माँगा, सैलाब कहाँ माँगा था;

गहरे सागर के तलहट में डूबा साहस बोल उठा,
हमने बस तिनका माँगा, पतवार कहाँ माँगा था; 

पूछ रहा है धर्म निरंतर, गिरते रोज़ आचरण से,
माँगा सिर्फ अनुसरण था,अवतार कहाँ माँगा था;

प्रश्न कर रहा समय को 'नीरज' उधड़ी हुई दरारों से,
थोड़ा बस जीवन माँगा, उद्धार कहाँ माँगा था;

 

Friday, June 23, 2023

 

ताउम्र रहे हमारे साथ,
जैसे बिन थामे से हाथ,​

​कुछ अनसुलझे हिसाब, ​
​​ कुछ अधबुने ख़्वाब,
​कुछ अनसुने सवाल,
कुछ अनकहे ज़वाब,
कुछ बंद नयन की बात,
कुछ बिन पायी सौगात,
कुछ उधड़े उधड़े गीत,
कुछ चुप्पी के संगीत,
कुछ पिघला पिघला रूप,
कुछ सहमी सहमी धूप,
कुछ चुभते चुभते शूल,
कुछ लज्जा जैसे फूल,

ताउम्र रहे हमारे साथ,
जैसे बिन थामे से हाथ,​

जब नियति ने,
कितने ही झरोखों से,
है हम सबको नवाज़ा,
फिर हम उम्र भर,
क्यों रहे देखते,
वह बंद दरवाज़ा ;



 

Saturday, June 17, 2023

 

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;

गाँव के बाग़ में, खेत खलिहान में,
सांझ में, रात में, दिन के अभिमान में,
सुध भी रह रह कर आँखें भिगोती रही,
और सावन बरसता रहा आन में;

भीगने की जो ख्वाहिश कभी संग थी,
ख्वाहिशों के समंदर भी झूरे रहे,

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;

आसमां सी ज़मीं अब है लगने लगी,
भोर होने तक रातें भी जगने लगी,
अपनी आवाज़ सोचा था पहुंचेगी पर,
दिल की चीखों को तन्हाई ठगने लगी;

शोर हासिल नहीं, जानता था मगर,
मौन के सारे पल भी न पूरे रहे,

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;