Saturday, June 17, 2023

 

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;

गाँव के बाग़ में, खेत खलिहान में,
सांझ में, रात में, दिन के अभिमान में,
सुध भी रह रह कर आँखें भिगोती रही,
और सावन बरसता रहा आन में;

भीगने की जो ख्वाहिश कभी संग थी,
ख्वाहिशों के समंदर भी झूरे रहे,

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;

आसमां सी ज़मीं अब है लगने लगी,
भोर होने तक रातें भी जगने लगी,
अपनी आवाज़ सोचा था पहुंचेगी पर,
दिल की चीखों को तन्हाई ठगने लगी;

शोर हासिल नहीं, जानता था मगर,
मौन के सारे पल भी न पूरे रहे,

जिसको चाहा था लिखना कभी उम्र भर,
वक़्त के सारे खत वो अधूरे रहे ;


 

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