ताउम्र रहे हमारे साथ,
जैसे बिन थामे से हाथ,
कुछ अनसुलझे हिसाब,
कुछ अधबुने ख़्वाब,
कुछ अनसुने सवाल,
कुछ अनकहे ज़वाब,
कुछ बंद नयन की बात,
कुछ बिन पायी सौगात,
कुछ उधड़े उधड़े गीत,
कुछ चुप्पी के संगीत,
कुछ पिघला पिघला रूप,
कुछ सहमी सहमी धूप,
कुछ चुभते चुभते शूल,
कुछ लज्जा जैसे फूल,
ताउम्र रहे हमारे साथ,
जैसे बिन थामे से हाथ,
जब नियति ने,
कितने ही झरोखों से,
है हम सबको नवाज़ा,
फिर हम उम्र भर,
क्यों रहे देखते,
वह बंद दरवाज़ा ;
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