कभी सोचा था की एक
दिन जब दर्द नहीं रहेगा तब फिर अठखेलियाँ होंगी जीवन में ; फिर किक लगाएंगे
फुटबॉल को या कलाकारियाँ करेंगे बास्केटबॉल से। फिर महसूस करेंगे हांफती
साँसों के बीच रिसते खारे पानी को ; फिर सो सकेंगे थकान की लोरियों में ;
फिर कूद कर फांद सकेंगे इन सीढ़ियों को या लांघ सकेंगे एक छलांग में इन
ड्योढ़ियों को। फिर उन वादियों में जाएंगे और फिर. . . . . . . . . . अच्छे
दिन आएंगे।
पर ये उन दिनों के स्लिप डिस्क का दर्द है जो जाते जाते भी कभी नहीं गया।
