Tuesday, September 4, 2018

वैसे हर सीख को दिमाग़ में सजाना होता है,
कुछ को लेकिन वक़्त पर भुलाना होता है,
कितना कुछ भूल जाता है इन राहों में पर,
वह जो बच जाता है, असल खज़ाना होता है;

Thursday, June 14, 2018

तुम मेरा उद्गम नहीं थे,
पर राह में जाने क्यों लगा,
शायद संगम हो तुम से,
मेरी आस, आस ही रही,
मैं फिर भी बहती रही अकेली,
धीमी रफ़्तार से,
इस उम्मीद में,
कि शायद तुम सागर बन जाओ,
पर  ...... क्या करती,
मै नदी थी,
मुझे कहीं तो मिलना था।

Monday, June 11, 2018

मेरे अपने हैं

तुम चले गए दूसरे देश पर तुम्हे याद रहा यहाँ का गर्म मौसम, यहाँ की धूल मिट्टी, यहाँ की बजबजाती बरसाती नालियां, सड़कों पर बेपरवाह हार्न बजाती गाड़ियाँ। याद रहा तुम्हे एक चरमराती व्यवस्था , दफ्तरों के चक्कर, घूसखोरों की मांगें, ट्रेन का शोर, प्लेटफार्म की आवाज़ें।

भूल गए तुम कि इसी व्यवस्था में बनवाया था तुमने पासपोर्ट, एकाध नकली दस्तावेज़, ली थी ट्रेनिंग किसी इंटरव्यू की, कि इतना ही सच बोलना है और इतना झूठ, और पहुँच गए थे एम्बेसी वीसा लेने। कितना गर्व हुआ था जब वीसा लग गया था।
आज भी तुम्हें वह सब याद है, तभी वहां हजारों मील दूर से भी तुम उलाहना देते हो, शिकायतें हैं भारतीय प्रशाशन से, यहाँ के मौसम से, यहाँ के लोगों से, उनकी अनपढ़ बातों से, उनके सलीके से, कुछ भी करने के तरीके से।  सब याद है तुम्हें।
पर तुम कुछ भूले भी। गर्म धरती पर बारिश की सोंधी महक भूल गए, बादलों के बीच पेड़ों पर झूले भूल गए, ढाबों की लस्सी भूल गए, कुल्हर के चाय की चुस्की भूल गए। भूल गए तुम माँ की हाथों के निवाले, भूल गए बहन की हाथों की मेहंदी, भूल गए भाई से जिद्द करना, भूल गए कैसे मिलजुल कर रहना।

सरलता भूल गए, तरलता भूल गए, जो तिल तिल कर बाप ने जोड़ी थी, वो अभूतपूर्व सफलता भूल गए। शायद याद हो तुम्हें वो जेठ की दुपहरी और अंजुरियों से पीना बाल्टी भर पानी। जहां पर अंतिम बार हथेलियों से पानी पिया था, वहां मिट्टी अब भी गीली है।
 अब वहाँ का सब अच्छा है, यहाँ सब असभ्य हैं ; अब तुम अलग हो, तुम्हारा देश भी अलग।  समझाने से कहते हो कि तुम क्या जानो ; शहर क्या होता है, लोग क्या होते हैं, व्यवस्था क्या होती है, शासन क्या होता है , तुम तो कभी रहे ही नहीं । पता नहीं सच क्या है ; जब हम आज़ाद हुए थे तब क्या जानते थे की गुलामी के माने बदल जायेंगे। तुम खीज कर कह देते हो मुझे की अंगूर खट्टे हैं।
मैं अब भी मुस्कुराता हूँ, चाहे कितने भी खट्टे हों, मेरे अपने हैं।

Friday, April 20, 2018

सोचा है तुमने कभी,
कि सरस्वती घाट पर यमुना की बयारें,
क्यूँ मद्धिम से कानों में कुछ कहती हैं;
कि उस कतार में उड़ते जुगनुओं की रौशनी,
क्यूँ देर रात तक दिल में जगती हैं;
कि क्यूँ जब तुम नहीं होती हो यहाँ,
तब भी गुज़रती है हर शाम वहीँ;
क्यूँ ये हवाएँ हैं एहसास दिलातीं,
कि फिर तुमने धीरे से कोई बात कही;

सोचा है तुमने कभी,
कि क्यूँ तुम्हारे केश उड़ते हैं मुझपर,
जैसे कोई मन ही मन शर्मिंदा है;
और क्यूँ तुम्हारे हाथों का स्पर्श,
मेरी हथेलियों पर हर वक़्त ज़िन्दा है;

कि क्यूँ फूली सरसों पर मंडराते भौंरे,
महज़ सौगात नहीं है फसलों की;
और गुलाब की पंखुड़ी पर ओस की बूँद,
क्यूँ याद दिलाती हैं अधरों की;
​सोचा है तुमने कभी,
कि क्यूँ अब खाली खाली कमरे,
लगते हैं फिर सजे भरे;
​और ये वृक्ष बीच पतझड़ भी,
लगते हैं क्यूँ हरे हरे;

कि क्यूँ अब फिर वीरान हृदय में,
साँसों सा कुछ चलता है,
क्यूँ तुमसे यूँ बातें करना,
मुझको अच्छा लगता है;

Thursday, April 5, 2018

क्या तुम्हें पता है,
कि अब भी, जब भी,
बादल घिर आते हैं,
मैं छत नहीं खोजता,
अपने पेड़ के नीचे रुक जाता हूँ ;
कि अब भी, जब भी,
भीग जाता हूँ,
तो सीधा रास्ता नहीं लेता,
लम्बे रास्ते से ही जाता हूँ ;

क्या तुम्हें पता है,
कि वो सूना सा खंडहर,
अब नहीं रहा,
अब वहां मॉल है,
और ढेरों गाड़ियाँ पार्क हैं,
पर फिर भी, अब भी,
जब मैं आँखें बंद करता हूँ ,
तो तुम्हारी फुसफुसाहट,
साफ़ सुनाई देती है;
क्या तुम्हें पता है,
हमारा रास्ता,
अब और चौड़ा हो गया है,
और अब किसी को,
कोई मतलब नहीं,
कि कौन किसके साथ,
अब इस रास्ते पर,
हाथ थामे चलता है;
पर तुम्हें कैसे पता होगा,
तुम अब बड़ी सरकारी अफसर हो,
और मैं इतना पढ़कर छोटा बाबू भी नहीं,
काश तुम भी पढाई में तेज़ होती,
काश तुम भी मेरी ही जात की होती,
काश तुम्हें सरकारी योजनाओं का,
पता न होता,
और काश हमारे देश में,
आरक्षण न होता,
तो अब भी,
मैं और तुम साथ होते।
neeraj tripathi

Wednesday, March 28, 2018

खाद दिया, पानी दिया,
प्यार दिया ;
पर दूब नहीं आयी,
फिर पता लगा,
इस हिस्से में ओट है,
सूरज नहीं आता,
पर मैं तो आदमी था,
सूरज कहाँ से लाता।
वनस्पति इसके,
कि चाँद समझ लेता उस हिस्से को ,
मैं खोजता रहा सूरज,
भरी दुपहरी;
सब के हिस्से था,
थोड़ा थोड़ा सूरज,
बस नहीं था,
उस छोटे से बंजर के लिए।
आज भी खोज रहा हूँ,
वह थोड़ी सी ऊष्मा,
जो कर दे हरा,
मेरे उस अंश को,
कहते हैं ज़मीन घूमती है,
धूरी पर;
शायद वो हिस्सा भी आये,
सूरज की पकड़ में।
शायद ये विज्ञान के विरुद्ध है,
पर दिल,
नहीं मानता कोई ज्ञान,
बस बाट जोहता है सूरज की,
और यूँ भी,
ये तो बंजर ज़मीनों का नसीब है,
नाउम्मीदी भी रही,
और इंतज़ार भी  ......

Wednesday, January 17, 2018

वो, जो झरता है बातों से,
या मिलता है मुलाकातों से,
या छलकता है पैमानों की,
उन गुज़री हसीन रातों से,
वो जो रिसता है छत्तों से,
या बारिश में पत्तों से,
फूलों की छाती से,
या ख्वाबों की बाती से,
सब प्रेम से लस होता है,
और वास्तव में रस  होता है।

पर वह, जो सुनाई नहीं देता,
पर गूंजता रहता है हवाओं में,
यूँ तो दिखाई नहीं देता,
पर मौज़ूद रहता है फ़िज़ाओं में,

वह, जो कहते कहते,
होठों पर अटक जाता है,
और पलकों पर आने से पहले,
आँखों में ही भटक जाता है,
ये भी यूँ ही बरबस होता है,
पर सच,यह भी रस होता है।

​सूनी ह्रदय की नलियों में,
यही रस कभी जम जाता है,
उपाय करते हैं पिघलने का,
पर तब वक़्त थम जाता है,
कैसे बताऊँ तुम सब को,
तब छाती में दर्द सख़्त होता है,​
ये महज़ समय समय की बात है,,
वरना नीरस तो बस वक़्त होता है।

Monday, January 1, 2018

चूल्हा वही, बिजली वही, पानी वही,
दूध रख बिसर जाने की नादानी वही;
सूरज वही, जाड़ा वही, कोहरा वही,
मफलरों में काँपता चेहरा वही;

सड़कें वही, दफ्तर वही, गति भी वही;
वातावरण से श्वास की क्षति भी वही;
तुम भी वही, हम भी वही, जग भी वही;
औ धमनियों में बह रहा रंग भी वही;
जब दिन वही, शामें वही, रातें वही,
फिर क्या नया इस साल है, जब सब वही,
गम नहीं जो बिजली चूल्हा और है पानी वही,
कुछ नयी है भूख अपनी और नादानी नयी,
जाड़े कोहरे और सूरज से नहीं दुनिया वही,
जब हमारी सोच से है हृदय में गर्मी नयी,
चाहे हों सड़कें और दफ्तर और चाहे गति वही,
है नया कुछ रोज़ करना, दिल में कुछ चाहत नयी,

बेशक हैं हम तुम और अपने रक्त की रंगत वही,
पर नयी उम्मीद से नवरंग भरने हैं कई,
तो क्या हुआ जो दिन वही शामें वही रातें वही,
हों हौसले से नवदिवस, नवस्वप्न से रातें नयी,
यूँ तो दुनिया नज़र के बदलाव से लगती नयी,
पर है असल में तब नया जब दोस्त रहते हैं वही।

बंगाली है एक अनोखी भारत को सौगात,
मुहँ हम पूरा खोला करते जब करते हैं बात।
तभी भजन भोजन कहलाता हैप्पीनेस आनन्दो,
​नीरज की घोड़ी के देखो कांटे हो गए बोन्दो। 
​आज अपर्णा स्वयं अनिल को देती है आशीष,
रहो सुहागन तुम दोनों बच्चे हों पूरे बीस। ​
​और सखी है एक माधवी जिसकी लम्बी जीभ,
क्या जाने क्या होती है गंगा जमुनी तहज़ीब।
ना ही अहमदाबाद मिले ना मिले इलाहाबाद,
लेकिन यादों का जीवन तो सदा रहा आबाद।​