Monday, January 1, 2018

चूल्हा वही, बिजली वही, पानी वही,
दूध रख बिसर जाने की नादानी वही;
सूरज वही, जाड़ा वही, कोहरा वही,
मफलरों में काँपता चेहरा वही;

सड़कें वही, दफ्तर वही, गति भी वही;
वातावरण से श्वास की क्षति भी वही;
तुम भी वही, हम भी वही, जग भी वही;
औ धमनियों में बह रहा रंग भी वही;
जब दिन वही, शामें वही, रातें वही,
फिर क्या नया इस साल है, जब सब वही,
गम नहीं जो बिजली चूल्हा और है पानी वही,
कुछ नयी है भूख अपनी और नादानी नयी,
जाड़े कोहरे और सूरज से नहीं दुनिया वही,
जब हमारी सोच से है हृदय में गर्मी नयी,
चाहे हों सड़कें और दफ्तर और चाहे गति वही,
है नया कुछ रोज़ करना, दिल में कुछ चाहत नयी,

बेशक हैं हम तुम और अपने रक्त की रंगत वही,
पर नयी उम्मीद से नवरंग भरने हैं कई,
तो क्या हुआ जो दिन वही शामें वही रातें वही,
हों हौसले से नवदिवस, नवस्वप्न से रातें नयी,
यूँ तो दुनिया नज़र के बदलाव से लगती नयी,
पर है असल में तब नया जब दोस्त रहते हैं वही।

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