Tuesday, May 31, 2011

और कहाँ जायेंगे...

व्याकुल सुबह, मचलता दिन और भर्राई शाम,
हँसता दुःख, रोती ख़ुशी और लवों पर नाम,
मेरा भी, तेरा भी, संदेशों का पैगाम,
कुछ गलतियों से सीख, कुछ उनका अंजाम,
कितना कुछ तो पा लिया, और क्या पायेंगे,
तुम्हारे दर से लौटे हैं अब और कहाँ जायेंगे...

Monday, May 30, 2011

भूसे में दबी बोरियां

रोज़मर्रा की जिंदगी रोज़ ही मुंह बाए खड़ी रहती है I एक तरह की सुबह, एक ही तरह का दफ्तर, वहां तक पहुँचने का वही रास्ता, वही लोग, एक ही तरह का काम, उसी तरह की वापसी, वही घर, वही शाम और वही हतप्रभ सी घूरती रात I हतप्रभ सी इसलिए क्योंकि ये रात आश्चर्य करती है; कैसे गुज़ार लेते हैं हम प्रत्येक दिन एक ही तरह, किसी मशीन की तरह, भोर से अंधेर तक...और फिर भोर तक I यह मुझे अदभुत लगता है; इसलिए क्योंकि हर दिन मेरे साथ कुछ न कुछ नया होता है, अच्छा या बुरा पर कुछ अलग सा, परन्तु अगले दिन जब मैं मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीता दिन और दिनों की तरह ही लगता है...नियमित सा I ऐसा क्या है जो मुझे नया, नया सा नहीं दिखता; क्या है जो खो गया है; या क्या है जो अन्दर है पर दबा हुआ है, भूसे के ढेर में दबे गेहूं की बोरियों की तरह I

मेरे घर के बाहर टंगे झोले में रोज़ सवेरे चार बजे कोई व्यक्ति दूध के पैकेट्स डाल जाता है और उसी झोले में पड़े कागज़ के कूपन को निकाल जाता है I कोई पचास बरस का यह व्यक्ति पिछले सत्ताईस बरसों से यह काम लगातार कर रहा है I रोज़ तीसरी मंजिल की सीढियां चदता और उतरता है; कई अपार्टमेंट्स में; ऐसा क्या है इस कार्य में जो उससे जिंदा रखता है ? वह तो शायद कभी मन भर कर सुबह सोया ही नहीं; क्या ये महज़ पेट की आग है, या परिवर्तन की आशंकाओं का भय, या इस काम में उसे एक आनंद आता है, या कोई सुकून मिलता है I मैं नहीं जानता; मेरे गाँव में मोहना कुम्हार है जिसे आज मैं पैंतीस बरसों से चाक पर कुल्हड़ बनाते देख रहा हूँ I उसके बेटे ये काम नहीं करते और आज वो शहर जाकर कमा खा रहे हैं; मेरे पूछने पर वह कहता है कि बेटवा इही माटी से आई रहे, इही माटी में मिल जाब; सोचा इही माटी के साथे टैम निकाल लेई...माना कि ये उसका पुश्तैनी काम है पर क्या इंसान कभी ऊब नहीं जाता, या क्या उसे कभी बदलाव का मन नहीं करता, या क्या उसे इस माटी में वास्तव में वह सब कुछ दिखता है जिसे मैं दसों दिशाओं में नहीं देख पाता ?

ऐसे ढेरों सवाल रोज़ आते हैं और रात्रि को मेरे साथ बिना जवाबों के सो जाते हैं I ऐसा नहीं है कि जीवन में परिवर्तन नहीं हुए; अवस्थाएं बदली, परिवार बढे, कुछ कम भी हुए, कुछ रहन सहन बदला, नौकरी बदली, मकान बदले, मित्र बदले, यहाँ तक कि हाथ कि रेखाएं बदली ! कितने नए लोग, नई जगहें, नए आयाम मिले; कितने पुराने लोग नए अंदाज़ में मिले, कितने नए लोग पुराने अंदाज़ में बिछड़े; माता पिता, भाई बहन के परिवार के प्रति विचार बदले, अपने ही जीवन में भविष्य के प्रति चिंताएं बदली, वस्त्र बदले...शायद कुछ आत्माएं भी बदली; सब कुछ तो बदला...फिर क्या है जो रोज़ सुबह एक सा दिन मुहं बाए खड़ा रहता है और कहता है...कुछ नहीं बदला; तुम तब भी वही थे, तुम अब भी वही हो...निरर्थक...बिलकुल खाली I

गुप्त जी पंचवटी में कहते हैं,
 "परिवर्तन ही यदि उन्नति है,
 तो हम बढ़ते जाते हैं,
 किन्तु मुझे तो सीधे सच्चे,
 पूर्व भाव ही भाते हैं "
ये किन भावों कि बात कर रहे हैं? वो जो परिवर्तन से परे हैं या होने चाहिए ....ये क्या हमारे संस्कारों की बात है या उन मानवीय भावों की जिनमे अमूमन समय के साथ परिवर्तन नहीं होना चाहिए जैसे प्रेम, वात्सल्य, दया, क्रोध, द्वेष, इर्ष्या आदि ? यद्दपि इन भावों में बदलाव नहीं आये, किन्तु इनके क्रियान्वन में, या इन भावों को व्यक्त करने में अनेकों बदलाव आये हैं I फिर क्या है जो निरर्थक जान पड़ता है, जो खाली दिखता है, जिस पर उमंगें असर नहीं करती, जिस पर संदेह रहता है ?

शायद ये मेरे देखने का नज़रिया है...शायद; जब मुस्काते फूल दिखते हैं पर मुस्कराहट महसूस नहीं होती, जब व्यंजन का ज़ायका होठों पर नहीं टिकता, जब पायल का सम्मोहन चंद पलों का होता है, जब रागिनी की धुन सुनने के पश्चात गायब हो जाती है, जब भोर की किरणें धूप लगती हैं, जब सांझ की बेला भ्रम पैदा करती है, तो निश्चित ही दोष फूल,व्यंजन, पायल, रागिनी, किरण,या सांझ का नहीं है, इनको देखने वाली नज़रों का है, इन्हें महसूस करने वाली मासूमियत का है, इनको समझने वाले भावों का है.....मेरा है I

इन रास्तों पर भागते भागते कहीं बीच में कुछ गिर गया शायद...पर उसे खोजने वापस उन रास्तों पर जाने की ज़रूरत नहीं है I ये मेरे अन्दर है...हमेशा से था...हमेशा रहेगा; इसे मैं फिर उभार सकता हूँ, उन बोरियों को भूसे में से निकाल सकता हूँ, उन गेहुओं की रोटियां फिर खा सकता हूँ; ये मुश्किल नहीं है...नहीं होना चाहिए...महज़ अपने मन का डर निकालना है I अनिश्चित भविष्य की अनिश्चितता से नहीं घबराना है, जो है उसे पाना है, जो नहीं है वो कभी था ही नहीं I  कुछ पुरानी पंक्तियाँ याद आती हैं;
"बसों नगर की ऑर अगर डरते हो वन से,
घर में छुपो अगर डरते हो काले घन से,
छुप जाने की जगह नहीं सारी दुनिया में,
अगर कहीं डरते हो तुम अपने ही मन से"



Friday, May 27, 2011

आसान दिखता है

कभी तुम भी यहाँ नहीं थे,
कभी हम भी यहाँ नहीं थे,
तब भी मुश्किलें थी,
अब भी मुश्किलें हैं,
पर दो आँखों से,
...और चार आँखों से,
देखने में फर्क होता है,
ज़रा से साथ से,
मुश्किलों का अस्तित्व,
गर्क होता है.
खालीपन की पेचीदा दीवारों से,
जब बूँद बूँद दर्द का लहू रिसता है,
और फर्श पर खून के धब्बे,
अगर मुश्किल नहीं लगते,
तो सब आसान दिखता है...

Monday, May 23, 2011

मेरे चमड़े का जूता

इन गर्मियों में,
अकस्मात् छाये बादल,
कहते हैं की,
हम नहीं बरसेंगे...
तो क्या हम यूँ ही,
मोतियों को तरसेंगे....
पर मैं जानता हूँ,
की आज नहीं तो कल,
ये बरसेंगे...
क्योंकि मेरे पास,
पानियों का अभाव है,
और बरसना तो,
बादलों का स्वभाव है...

आँख मिचौली खेलती धूप,
कहती है मुझे पकड़ो,
और हर बार,
छिटक कर दूर चली जाती है,
और मेरे मायूस होने पर,
फिर पास चली आती है...
मैं जानता हूँ की,
वो मुझे चिढ़ाती है,
उसके और मेरे बीच,
दूरियां कहाँ नपनी है;
और वो कहीं भी चली जाए,
ये धूप मेरी अपनी है.....

ये आज है मेरा,
जो कल के मिलन को सरक रहा है,
ये दिल नहीं मीठा सा दर्द है,
जो ज़ोरों से धड़क रहा है...
ये कुछ बची तमन्नाएं हैं,
जो ख़ुशी से झूलती हैं,
जैसे खुली आंच पर,
घर की रोटियां फूलती हैं...
जब कल आएगा,
छिटकी चांदनी में बरसात लाएगा,
मेरी खिड़की का पट तब,
भीग जाएगा...
और गर्मियों में तपा,
बालकनी में रखा,
मेरे चमड़े का जूता भी,
भीगना सीख जाएगा...

Saturday, May 21, 2011

अदृश्य तार

एहसासों के अदृश्य तार,
बंधनों में नहीं बंधते,
कोई संकल्प, कोई वादा,
नहीं करते,
किसी को चोटिल करने का,
इरादा नहीं करते,
ये तो बस,
रूह को रूह से पिरोते हैं,
और तन बदन कितना भी हँसे,
ये भावनाओं की खातिर,
ज़रा चुपचाप रोते हैं,
महज़ जिन्दा रहना ही,
इनका मकसद नहीं,
ये बहकी हुई हवाओं को भी,
ज़रूरत पड़े तो मोड़ देते हैं,
एहसासों के अदृश्य तार हैं ये,
ये भौगोलिक दूरियों को,
पल भर में जोड़ देते हैं.

Friday, May 20, 2011

भूल गया

किसी ने बड़े सलीके से तह करके,
दराजों में बंद किया,
और फिर खोलना भूल गया,
किसी ने ताबूत में उतारा,
मिटटी में झुकाया,
...और ढंकना भूल गया,
किसी ने बड़ी बड़ी बातें की,
सपने दिखाए,
और सुलाना भूल गया,
इन सब के बावजूद जिंदा हूँ,
रात का तीसरा पहर है,
पर कोई कहता है,
इसके बाद सहर है......

Thursday, May 19, 2011

आसमां झुकता है

कभी कभी अपनी आवाज़,
किसी अनदेखे पहाड़ से,
टकरा कर,
वापस लौट आती है,
कभी कभी,
सुबह के इंतज़ार में,
रात के बाद,
फिर रात ही आती है,
जिंदगी तब,
बेईमान लगती है,
और बिलकुल नहीं भाती है;
कभी लाख कोशिशों के बावजूद,
एक राही छूट जाता है,
बहुत सँभालने पर भी,
कांच का गिलास,
टूट जाता है,
कभी अरमानों का पुलिंदा,
एक मन में,
सिमट नहीं पाता है,
और कितना भी,
खाद दो, पानी दो,
बगीचे का एक पौधा,
रोज़ सूख जाता है;
और ऐसे में,
उदास मन,
करवटों में हिलता है,
फटे हुए दिल के कपड़ों में,
कुछ पैबंद सिलता है.....

पर ये कोई टकराव नहीं,
कोई बिखराव भी नहीं,
जीवन की निशानी है,
कोई जमी हुई बर्फ नहीं,
बहता पानी है,
ये कभी मेरी कविता है,
कभी तेरी कहानी है;
रास्ते तो चलते रहते हैं,
और उन बंद मोड़ों पर,
ये पथिक,
जब चेहरा ज़रा घुमाता है,
किसी जादुई सिमसिम की तरह,
एक नया रास्ता,
पाता है;
थकन की उन शामों में,
तब फिर से हौसला,
आता है,
और  उसी मेज़ पर,
कांच के टुकड़े नहीं,
वो एक नया गिलास,
सजाता है;

ये सब मात्र नजरिया है,
उन्ही आँखों से,
दोनों समां दिखता है,
दर्द खोजोगे तो दर्द,
वरना रहनुमा,
दिखता है,
अब बंद करो रोना,
तारों का टूटना कहाँ रुकता है,
ज़रा सी कोशिशों से नीरज,
तुम्हारे आँगन में,
ये सारा आसमां झुकता है....

Wednesday, May 18, 2011

यादों की रेशम

कोई नदी नहीं है, समंदर भी नहीं है,
कोई पोखर नहीं, कोई झरना भी नहीं है,
फिर भी इक लहर है,
जो बही चली आती है,
दूर तक इक नीर की बूँद भी नहीं,
ये कैसी तन्हाई है,
जो भिगोकर चली जाती है...

ये कुछ यादों की रेशम है,
इसमें मखमल है,
इसमें एहसास है,
सिसकती शबनम है;
ये मेरे उजाले की बाती है,
कोई कुछ भी कहे,
पर मुझे अब भी,
याद आती है,
मैं इसकी कशिश को,
आहिस्ता आहिस्ता चुनता हूँ,
कोई जुलाहा नहीं हूँ,
पर बड़ी तल्लीनता से,
रेशम बुनता हूँ.....

Sunday, May 15, 2011

असमतल धरती...सरल जीवन

ये रास्ते काफ़ी दूर तक साथ चलते हैं I चीड़ों की आवारगी भी इनके साथ चलती है, और साथ चलते हैं कुछ हल्के तैरते बादल और इन पहाड़ों के लोगों की हल्की तैरती हसरतें I ये पहाड़ कुछ नहीं बोलते, बस खड़े रहते हैं; जैसे किसी निरंतरता के प्रतीक हैं I सड़क के अनगिनत मोड़ों पर मुडती गाड़ी अनायास ही चलती रहती है, मानो ये उसका नियम है; मानो वो इन सब से भली भांति परिचित है I इसी सड़क के एक मोड़ से कुछ नीचे उतर कर, और कुछ ऊपर चढ़ कर, कुछ टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से गुज़र कर, कुछ पथरीली सीढियां चढ़कर....एक घर है; जिसके गुसलखाने में एक बाल्टी में भिगोये हुए कुछ कपड़े हैं जो अपने हिस्से की धूप की प्रतीक्षा कर रहे हैं I

यह एक छोटा किन्तु बड़े ही सलीके का घर है I एक कमरा और उससे ही किसी पेड़ की डाल की तरह निकली छोटी सी रसोई और कमरे से जुड़ा गुसलखाना जिसके बाहर का दरवाज़ा बिल्ली की दया दृष्टि से बंद रहता है; बेशक अन्दर कोई हो या न हो I लकड़ी की छत, और कमरे की ही दीवार से सटी लकड़ी की सीढ़ी जो ऊपर छज्जे की तरफ जाती है I ये एक लोफ्ट है, यानि की दोछत्ति I इसी लोफ्ट से पूरब की ऑर निकलती छोटी छोटी तीन खिड़कियाँ हैं जो इन पहाड़ों की लाचारी रोज़ देखती हैं I कमरे का दरवाज़ा खोलते ही छनी हुई धूप अपने होने का आभास  देती है I

घर के बाहर निकलते ही लगभग पांच वर्ग मीटर का घास युक्त मैदान, यहाँ वहां गमलों में और यूँ ही धरती पर रोपे फूलों के पौधे, ढलान से बातें करते आडू और प्लम के हल्के से शर्मीले छोटे वृक्ष और उनमे जन्मे छोटे छोटे फल जिनके बढ़ने का इंतज़ार उन्हें भी है और इस घर के प्राणियों को भी; और अवश्य ही कुछ व्यापारियों को भी I कुमाउन की पहाड़ियों पर एक छिटके से गाँव का एकांत में खड़ा यह घर कई आशाओं को एक साथ बयान करता है I

साथ ही है जुड़ा हुआ मकान मालिक का घर जिसमे रहते हैं दो पिल्ले, एक बिल्ली, एक आदमी, उसकी औरत और उनके चार बच्चे और दो मवेशी I और एक किरायेदार...और उसकी ढेर सारी आशाएं, आकान्शाएं और शायद थोड़ी सी अपेक्षाएं I सब को प्रतीक्षा है; हर जीवन प्रतीक्षा करता है; कभी कभी तो ये भी नहीं पता लगता की ये प्रतीक्षा किसके लिए है या ये बस यूँ ही है..अनायास I
सूरज यहाँ पहाड़ों से छिप कर निकलता है, और जब तक लिहाफों के अन्दर से हम आँखें खोलते हैं, सूरज हमारे चेहरे पर होता है...जैसे ये दूर पूरब से न निकल कर इस घर के ऊपर ही उगा था I बाल्टी में भिगोये कपडे अब भी प्रतीक्षा करते हैं ; उन्हें अपने हिस्से का और पानी चाहिए...और धूप भी I

असमतल और उबड़ खाबड़ धरतियों पर चीड़ सीधे खड़े रहते हैं; प्रेरणा देते हुए की जीवन सरल रहता है यदि हम स्वयं को सीधा रख सकते हैं; इन असमतल रोज़मर्रा की मुसीबतों के बीच I पैंतालिस मिनट के लगातार चढ़ाई और ढलान के बाद एक दफ्तर है I इन रास्तों पर धीरे धीरे चढ़ते उतरते कदम बहुत दूर तक दीखते हैं; कन्धों पर पिठूनुमा बैग टाँगे हुए; कानों में इअरफोन; संगीत को अपनी इस रोज़ की आवाजाही का हिस्सा बनाते हुए I अचानक ही वो कदम दीखने बंद हो जाते हैं; शायद इस पहाड़ के दूसरी ऑर चल रहे हैं, क्योंकि उनके दिखने का आभास काफ़ी देर तक रहता है; ठीक वैसे ही जैसे किसी पक्षी को कुछ देर हथेलियों में पकड़ने के बाद हम छोड़ देते हैं; खाली हथेलियों में उसकी मौजूदगी की गर्माहट उसके उड़ जाने के बाद भी काफ़ी देर तक महसूस की जा सकती है I

शाम को वही कदम उन्ही रास्तों पर वापस आते हैं; उसी अंदाज़ में जैसे वो गए थे I उनमे सिमटी थकान कोशिशों के उपरान्त भी ज़ाहिर होती है I यहाँ शाम अचानक ही आ जाती है क्योंकि सूर्य इन ऊंची पहाड़ियों के पीछे अचानक ही खो जाता है; और शाम के उजाले में ही चाँद दिखता है; कुछ शर्मसार सा; जैसे कोई स्त्री नहाने के बाद शर्माती है, खुले केशों में I बहुत सारी हसरतों और चाय के साथ शाम का आलिंगन रात से होता है; यही वो समय है जब जीवन बहुत थोड़े समय के लिए रुकता है..एक गुज़रे दिन में झांकता है, और आने वाले कल को बंद झरोखों से देखने की कोशिश करता है I कुछ हसरतों की आग पर कटी सब्जी गीले चावलों से मिलकर भाप में पकती है; कुछ वोदका गले के नीचे उतरते हुए  एक सीने को तरल करता है; और थोड़ा व्याकुल भी I फिर बहुत सारे सपने एक साथ आते हैं और थोड़े से नशे के बीच हसरतों की इकट्ठी हुई भीड़ में से हकीकत अपना सर ऊपर उठा कर कहती है कि मुझे देखो...असलियत में मैं ही हूँ...बाकी सब तुम्हारा ख़याल है I ग्लानि और नशे का शरीर रजाइयों में सोता है; हसरतें जगी रहती हैं, और बिजली के कृत्रिम प्रकाश में भी अँधेरा साफ़ दिखता है...ऊपर लोफ्ट में एक कंप्यूटर काफ़ी रात तक चलता है I

इस रात कि सुबह कई बार आती है; रात में भी और भोर में भी I यह अजीब है क्योंकि इसमें बीते आभास की झलक दिखाई देती है I वही कल का सूरज फिर निकलता है और मेरे ऊपर हँसता है, जैसे मेरे ख्यालों को वो रात भर पढता रहा था I दो प्याले चाय, और धुंए के उपरान्त उपमा और रात के बचे चावल एक बोझिल सी शांति के बीच पेट से आलिंगन करते हैं I हमारी सामाजिकता हमारा गहना भी है और शायद मज़बूरी भी I हमारी कथनी और करनी का फर्क यह साफ़ ज़ाहिर करता है की जब तक कोई ख़ास मज़बूरी नहीं आती, हम ये गहने नहीं उतारते I क्या हो सकता था और क्या नहीं हुआ के मद्देनज़र सामान फिर से बैग में सिमटने लगता है; कपडे तह हो जाते हैं, और हसरतों के जनाजे के साथ बैग की चेन एक सरसराहट सी करती हुई बंद हो जाती है I साथ ही दो दिनों से बाल्टी में भीगे कपडे धुल कर धूप के प्रेम को पाते हैं I इन कपड़ों से रिसता पानी ज़मीन का साथ पाकर उसमे ही खो जाता है; हसरतों के विपरीत I

बच्चे बस्तों के साथ पहाड़ियां चढ़ते उतरते हैं; कहीं इन्ही पहाड़ियों में छिपा एक स्कूल मेरा भी है; अभी वो नहीं दिखता पर निश्चित ही वो मुझे पुकारता है I अपना सामान समेट कर और कन्धों पर लादे, चढ़ती साँसों के बीच मैं कहीं से दूर निकलता हूँ, थोड़ा सा और अपने पास जाने के लिए I एक असमंजस भरा पाठ और सीखता हूँ; फटे हुए चमड़े में एक टांका और लगाता हूँ, एक नए से आभास के बीच आधा दिन और निकल जाता है और उन चीड़ के पेड़ों के बीच से होता हुआ टेढ़े मेढ़े रास्तों पर गाडी फिर सरकती है I इन पहाड़ों से दूर...समतल धरती की ऑर जहाँ जीवन इतना सरल नहीं है I


Thursday, May 5, 2011

मेरा रास्ता

आज की सुबह,
एक अरसे के बाद,
सौगात लेकर आई थी,
कुछ ऐसा लगा जैसे,
रात में,
चाँद की सगाई थी,
ये छोटा सा लम्हा है,
जो तेजी से,
निकल जाता हैं,
और जब तक स्वप्न,
यकीन में बदलता है,
समय गुज़र जाता है,
पर ये किस्मत का,
तोहफा है,
जो सुबह मैंने पाया था,
बेशक थोड़ी ही देर सही,
मेरा रास्ता,
मेरे साथ आया था....

खालीपन

इन सूखे पत्तों पर,
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है,
जैसे कोई गम नहीं है,
कुछ भरा भी नहीं है,
खाली है सब,
दूर तक....सब खाली है;
और इसी खालीपन में,
तुम्हारे होठों पर मुस्कां है,
और मेरे होठों पर,
गाली है,
और कितना भी,
हम अदला बदली करलें,
दूर तक....सब खाली है...

इसी खालीपन में,
एक दुनिया है,
जो थमती नहीं है,
जो गर्मियों में,
पिघलती नहीं है,
और ठण्ड में,
जमती नहीं है,
ये किसी के वजूद को,
तरसती नहीं है,
और कितने भी बादल घिर आयें,
जब चाहिए,
तब बरसती नहीं है.
इसी खालीपन में,
कुछ परिवार हैं,
माँ बाप हैं, यार हैं,
इसी में शौहर है, बीवी है,
एक प्यारी मुनिया है,
इसी खालीपन में,
एक दुनिया है....

इसी खालीपन में,
द्वन्द में जीना है,
इसी खालीपन में,
शांति से मरना है,
इसी खालीपन में,
दराजें हैं,
जिनमे तह करके,
रखी कुछ यादें हैं,
इसी खालीपन में,
मजारें हैं,
जिनमे सांस लेते,
कुछ अनकहे, अनसुलझे,
बेचारे हैं,
इसी खालीपन में,
चाँद है, तारे हैं,
और उनको बुहारने के,
अरमां हमारे हैं,
इसी खालीपन में,
कहीं की रात,
कहीं का सवेरा है,
कितना भी हम लड़ लें,
खालीपन में,
क्या तेरा है,
क्या मेरा है....

ये खालीपन,
हमारे साथ चलता है,
बंधनों के टूटने पर,
हाथ मलता है,
ये खालीपन,
ये भी समझता है,
कि ये शख्स कुछ ख़ास होगा,
तभी यह बावला,
उससे अक्सर लड़ता है.
और यही खालीपन,
याद दिलाता है,
कि कभी कभी चाँद,
मेरी खिड़की पर आता है,
इसी खालीपन में,
कोई कहता है,
कि लिखना बकवास है,
किसी को बुरा लगता है,
ये क्या महज़ एहसास है.
इसी खालीपन में,
कुछ पहचान है,
कुछ गलतफहमियां हैं,
और उनमें उलझी,
रोज़ ज़ाले बुनती,
मेरे दीवारों की मकड़ियाँ हैं....

इसी खालीपन में,
शोखियाँ हैं, शरारे हैं,
इसी खालीपन में,
भावनात्मक दरारें हैं,
किसी रोज़,
इसी खालीपन के,
पानियों में धुल जाऊंगा,
किसी साबुन की तरह,
इसी खालीपन में,
घुल जाऊंगा,
कुछ समय तक,
झाग रहेगा,
फिर सब साफ़ हो जाएगा,
कहाँ दाग रहेगा,
और क्या कर सकता हूँ,
घुलने से पहले,
क्या ले जाऊंगा,
कुछ और दूँ न दूँ,
अपना खालीपन,
दे जाऊंगा....

अब ख्वाहिशें नहीं हैं,
नुमाइशें नहीं हैं,
इस खालीपन में,
फरमाइशें नहीं हैं,
फिर भी, अब भी,
पैरों के नीचे,
दबते पत्तों की,
आवाज़ होती है,
और इस खालीपन में भी,
मजबूरियों की,
मुमताज़ सोती है,
इस खालीपन में,
अब भी एक,
शाहेजहाँ जगता है,
इन सूखे पत्तों पर,
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है.................


Monday, May 2, 2011


जिंदगी एक बार फिर तुझसे,
रूबरू होके सरलता पा लूँ;

इन असहज लम्हों में निकटता पा लूँ,
इस भागती बेसब्री में शिथिलता पा लूँ,
...कोई मंजिल मिले न मिले,
इन राहों को चलने में सफलता पा लूँ;

इन गर्म लू के थपेड़ों में सहजता पा लूँ,
इस प्यास में प्यास को तड़पता पा लूँ,
कोई वटवृक्ष मिले न मिले,
इस ह्रदय की छाया में तरलता पा लूँ;

जिंदगी एक बार फिर तुझसे,
रूबरू होके सरलता पा लूँ;

वो मकान मेरा था

पुराने पीपल के तने से,
जो चुनरियाँ झूलती हैं,
रेशमी सा इक ऐसा ही,
कभी अरमान मेरा था,

जहाँ पर आज बंधी,
ताबीज़ नज़र आती है,
कभी इन बाजुओं पर,
 इक निशान मेरा था,

जहाँ की खिडकियों पर,
आज परदे दीखते है,
पुराने वक़्त में,
 वो मकान मेरा था.

कुछ सपन बंद हैं

इन लम्हों का,
शोर भी,
ख़ामोशी है...
कोई अंगूर नहीं,
फिर भी मदहोशी है,
इस ख़ामोशी में,
कोई जिंदगानी है,
जिसके बोलने की ताक़त..
रूहानी है,
माना कि मुलाकातों के,
लम्हे चंद हैं,
पर इन आँखों में भी
कुछ सपन बंद हैं,

मेरे एक संस्मरण से

सब कुछ शांत है...मौन I दो छूहों पर टिकी छप्पर वाली दालान में रजाई ओढ़े हुए मैं इस सन्नाटे की आवाज़ सुनने की कोशिश करता हूँ I इस रजाई की रुई एक तरफ को खिसक गयी है; लिहाज़ा जिस तरफ रुई कम है उस तरफ से सिहरन बढ़ जाती है I हल्का सा सर बाहर निकलता हूँ तो तैरते हुए बादल दीखते हैं; कोहरा है ये जो रिस रहा है धरती की छाती पर I छूहे की खूँटी पर टंगी लालटेन अब भी जल रही है...हौले हौले I अम्मा देखेंगी तो गुस्सा होंगी; मिटटी का तेल जो नहीं मिल पाता है गाँव में....दो घंटों तक खड़ा रहा था कल, तब जाकर तीन लीटर तेल मिल पाया था I मुझे याद है बचपन में पिताजी हमेशा गाँव आने के समय मिटटी का तेल साथ लाते थे;  तब मैं हँसता था I माँ डांटा करती; गाँव में तुम्हारी अम्मा को तेल नहीं मिल पाता, इसलिए ले जाते हैं यहाँ से I पर लालटेन इन सब बातों से बेखबर इस जाड़े में अब भी जल रही है...और मिटटी का तेल हलके काले धुंए की शक्ल में कोहरे से मिलता जा रहा है I

मैं उठकर लालटेन बुझा देता हूँ, ज़रा भी आत्मीयता के बगैर; जैसे रात में दो घंटे उस की रोशनी में किताब पढना मेरा हक़ था, मेरी ज़रूरत नहीं I थोड़ी ही दूर खटिया पर अम्मा लेटी हैं; तीन कथरियाँ ओढ़े हुए...या शायद चार I सत्तर बरस की ये महिला मेरी माँ की बड़ी बहिन है और मेरे पिताजी की भौजी भी ; इक्कीस की अवस्था में विधवा हुई अम्मा ने न जाने ऐसी कितनी ही रातें देखी हैं...उनके लिए ये एक और रात के अलावा कुछ नहीं I
अचानक सियार बोलने लगते हैं...हुक्की हुआन, हुक्की हुआन ! गर्मियों में ये सारी रात बोलते हैं पर जाड़ों में अक्सर ये बिलों में घुसे रहते हैं I पुराने इनारे (कुआं) के पास के बाग़ में ये बांसों की कोठ में रहते हैं; ऐसा भ्रम मुझे सदा रहा क्योंकि आवाजें वहीँ से आती हैं I रोज़ शाम को इस इनारे से एक बाल्टी पानी घर में आता था क्योंकि और कहीं के पानी से दाल नहीं पकती I अब फिर से सन्नाटा है ...

कोने में मोतिया भी दुबका पड़ा है; ऐसे कितने ही कुकुर मैंने इस घर में आते जाते देखे हैं I रात को खाने के समय मोतिया बिलकुल पास बैठ जाता था...लगभग चौके में ही; पर अम्मा कुछ नहीं कहती, न उसे भगाती न पुचकारती; और यदि मैं दुत्कार देता तो भी कुछ नहीं बोलती I उन्हें पता है की मोतिया कहीं नहीं जाएगा...ये उनके साथी हैं; उनके अकेलेपन के I मुझे कभी कभी लगता है कि अम्मा ज़रूर उससे लिपट कर रोती होंगी  I अचानक पट्टीदार के घर से भौंकने की आवाज़ आती है; मोतिया तुरंत उठता है और सरपट भाग निकलता है आवाज़ की ऑर; गाँव के सभी कुत्तों में घनिष्ट एकता है...गाँव के लोगों के विपरीत I भौंकने की आवाजें बढ़ गयी हैं, पर अम्मा अब भी बेफिक्र मुहं ढक कर सोयी हुई हैं I पड़ोस का बूढ़ा पहलवान ज़ोर से लाठी ज़मीन पर पटकता है और गरियाता है; तोहरी माई की........और भौंकना आश्चर्यजनक रूप से बंद हो जाता है I सभी कुत्ते गालियों को समझते हैं यहाँ I

मोतिया वापस आ गया है, अपनी जगह पर जाड़े से लड़ने के लिए I जाड़े से लड़ना मुझे अच्छा लगता है;  कोने में दुबकी बिल्ली, पेट में मुहं छुपाये कुत्ता, सिकुड़ी सिमटी नारी, या पुरुष कोटधारी ; जब भी कोई जाड़े से लड़ता है, मुझे अच्छा लगता है I कोहरा अब भी रिस रहा है; और सुबह जब हम अपने शरीर को फैलायेंगे तो इस कोहरे को अपलक देखते रहेंगे I कैसे इकट्ठा होता रहा ये रात भर  जब हमने अपने शरीर उन कथरियों में सिकोड़ रखे थे I अब फिर सब मौन है...न सियार बोल रहे हैं न ही कुत्ते भौंकते हैं I एक रात और सरक रही है अहिस्ता से इन खेतों पर, इनके मेड़ों पर, इन बागों से,  इनारों से होते हुए, खलिहानों से, इन लोगों के घरों से और उनमे लटकी लालटेनों से I ये मेरे गाँव की जाड़े की एक रात है; ठंडी और लिसलिसी I इसमें जीवन सोता है, पर चलता रहता है.....

-------मेरे एक संस्मरण से ...

Sunday, May 1, 2011

मेरा उल्लू

आज क्यों आँखें अचानक नम हुई,
एक दिल की आरज़ू थी, कम हुई...

कोई कुछ भी कहे पर सदा मैंने ये माना है,
किसी को याद करना भी किसी के पास जाना है...
 उस अलसाई सी शाख पर,
जो मेरा उल्लू बैठा था...
किसी का दिन था वो,
मेरी रातों पर ऐंठा था,
कुहासे का वो आलम,
कैसे ख़ाक हुआ,
किसी को याद करना भी,
यहाँ मज़ाक हुआ....
 





आभास

हम समझते हैं तुम्हारी ये चुप्पी,
नासमझी की आड़ में इक मजबूरी है;
तुम जो कहते हो तुम्हे आभास है पर;
आभास का आभास भी बेहद ज़रूरी है


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