रास्तों के जुगनू
Sunday, April 21, 2013
कभी दिलवालों की रही, अब दरिंदों की है,
क्यों तेरे इस शहर में भूचाल नहीं आता,
वाह री लेखनी तेरी रोशनाई में,
लिखने के लिए अब ख़याल नहीं आता,
यूँ ही गुज़र जायेगी रही-सही 'नीरज',
अब किसी के लहू में उबाल नहीं आता।
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