इस जाड़े के शाम की सहमी धूप अब गुज़र जाना चाहती है I गार्डेन पाम के वृक्ष सीधे खड़े हैं; बिलकुल मौन जैसे निस्तब्धता को सार्थक कर रहे हों I बिजली के तारों पर बैठी चिड़ियाँ न जाने क्या आने या जाने की प्रतीक्षा कर रही हैं I लान में जबरन फैलाई गई हरी घास ओस से मिलन की आस में रात की बाट जोह रही हैं I अहाते की फेंसिंग पर लगे नारंगी फूल अब भी नारंगी ही दिखते हैं I बरगद की झूलती जडें धरती से चार फीट ऊपर ही रहती हैं I सब कुछ तो रोज़ की तरह ही है; बस एक और दिवस है जो भाग जाना चाहता है I मुझसे, तुझसे, हम सब से दूर.....कहीं और उजाला होगा; कहीं और कुछ हसरतें खुमारी आँखों में जगेंगी; कुछ रेशमी सी किरणें कहीं बर्फ पर पड़कर चांदी सी चमकेंगी; कहीं और दुनिया सजेगी; कहीं और जिंदगी चलेगी....
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