Sunday, November 20, 2011

जाड़े का कुहासा

वो बागों के सुनहरे वृक्ष नहीं जो दीखते हैं,
आँखों का नहीं है भ्रम, ये जाड़े का कुहासा है,
जो नयनों से छलकते थे कभी ख्वाबों में घुल कर के,
बड़े सूखे से बैठे हैं, कि जैसे जल ही प्यासा है,
कि यूँ खामोशियों के दलदलों में डूबते क्यों हो,
अभी तो रात बाकी है अभी से क्या निराशा है,
नहीं ग़मगीन रखना दिल, रहे वीरानियाँ जितनी,
जो रेतों में रहोगे तो ही जानोगे पिपासा है,
हवाओं के समंदर में नज़र जो ऋतु नहीं आती,
अभी जिंदा हैं साँसों में, अभी नयनों में आशा है....

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