तुम्हारे हर सितम सह गया हूँ मैं,
वक़्त के पानी सा बह गया हूँ मैं,
इस संसद में तुम्हारी नुमाइंदगी से,
बिन बोले ही सब कह गया हूँ मैं,
तुम्हारी सियासत की किताबों के,
किन्ही सफ़ों में तह गया हूँ मैं,
कैसे इन चुनावों के नतीजे में,
'आप' से 'वह' बन गया हूँ मैं,
अब भी चाहो तो मुझे खर्च करो,
ये जो थोड़ा सा रह गया हूँ मैं;
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