Wednesday, October 7, 2020

 

जब डगर में तुम नहीं थे,
रात थी, अंजुम नहीं थे,
मित्रसूची में हमारी,
हम तो थे पर तुम नहीं थे,

लोचनों की मूक बानी,
दृष्टिगत थी पर न मानी,​
रच रहे थे हम स्वयं ही,
कोई मिथ्या सी कहानी;

तुम जो होते तब कथा में,
घुल ही जाते उस प्रथा में,
देख मेरी विवश काया,
विघ्न बन जाते व्यथा में;

किन्तु जीवनमार्ग जल थल,
ढूँढना पड़ता स्वयं बल,
है अनिश्चित राह चलना,
ले कर आशाओं से सम्बल;

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