कौन समझेगा इसे,
ये कोई शख्स नहीं, कोई जगह भी नहीं,
कोई वस्तु नहीं, कोई कलह भी नहीं,
कोई मिलन नहीं, कोई गिरह भी नहीं,
कोई प्रीत नहीं, कोई विरह भी नहीं,
किसी धन दौलत की लालसा नहीं,
किसी अपने का कोई हादसा भी नहीं,
ये वो भी नहीं जो दिखाई दे,
वो भी नहीं जो सिर्फ सुनाई दे,
कौन समझेगा इसे,
कि क्यूँ आवश्यक है किन्ही ज़ज़्बों में,
ढीठ होना,
और आज भी लाठियों से अधिक ज़रूरी है,
पीठ होना।
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