रास्तों के जुगनू
Tuesday, December 22, 2020
आज भी वैसा ही दिन वैसी ही रात,
न भरोसा न दिलासा न ही बात,
रोज़ फल कर रोज़ पक जाता हूँ मैं,
रोज़ ज़रा सा और थक जाता हूँ मैं,
सपन लेकिन थकन से कितना बड़ा है,
उठ चलो कि दिवस मुँह बाये खड़ा है ।
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