जब सफर में शान्ति का लहरा रहा परचम खड़ा,
किन्तु फिर उन्माद क्यों है राह में बिखरा पड़ा,
प्रेम की बोली के यूँ तो हम सभी हक़दार हैं पर,
युद्ध के अवसान पर है लग गया पहरा कड़ा।
जब समस्या मूल से हट राजनैतिक रंग ले ले,
प्रक्रिया संवाद भी जब हठ की कोई जंग ले ले,
साक्षी इतिहास है कि जो दिशाभ्रम में अड़ा,
वह समय से हार बैठा, है समय सब से बड़ा।
क्षीण पड़ जाती दशा जैसे समय है बीतता,
अब नहीं कोई मनुज है हार कर के जीतता,
हो कृषक तुम या हो सैनिक या कोई नेता बड़ा,
धराशायी हो गया हठ, अंत तक था जब लड़ा।
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