अब यह मन है, अपने मन का अनमन बदले,
जो विषाक्त हो रहे थे उनका तन मन बदले;
अबलाओं की विवश दशा का विवश भी बदले,
जिनके भोर अंधेर रहे वह दिवस भी बदले;
भौतिकता तक सीमित यह अभिलाषा बदले,
कार्यालय में सम्बोधन की भाषा बदले;
वोटों के प्रेमी प्रतिनिधि का प्राज्ञ भी बदले
जिस हलधर का अन्न है उसका भाग्य भी बदले;
दीन जनों पर मात्र दया का अर्पण बदले,
जिसमे न मुस्कान दिखे वो दर्पण बदले;
मनुज प्रणय से वंचित रहा ह्रदय भी बदले,
अब की साल, साल ही नहीं समय भी बदले।
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