राह चलते मिल गए वो,
हमने पूछा जी कहाँ ?
उत्तर में वो पूछ बैठे,
तुम बताओ, तुम कहाँ;
पुत्र को जब माँ ने पूछा,
चले कहाँ हो? शीघ्र आओ,
उत्तर में वह पूछ बैठा,
काम क्या है ये बताओ;
कर्मचारी ने जो पूछा,
देख गड़बड़ कागज़ों से,
जानना है क्यों तुम्हें यह,
उत्तर आया अफसरों से;
किन्तु यह सब आम है अब,
प्रश्न ही अब सूझते हैं,
जो सदा थे मूक रहते,
प्रश्न वह भी पूछते हैं;
जो कलाई पर है रहती,
हर मिनट जो बूझती है,
क्या हुआ अच्छे समय को,
अब घड़ी यह पूछती है;
फूल कर आगोश में जो,
चुपड़ी घी में जश्न करती,
क्या तुम्हारी भूख हूँ मैं,
रोटियाँ अब प्रश्न करतीं :
रास्ते स्थिर थे रहते,
किन्तु अब भ्रम खा गए हैं,
चलते चलते पूछ बैठे,
ये कहाँ हम आ गए हैं ;
हम स्वयं भी उत्तरों के,
प्रश्न होकर रह गए हैं,
जो महल थे स्वप्न में वो,
रास्तों में ढह गए हैं;
प्रश्न हैं अब बोलियों में,
प्रश्न का समुदाय है,
प्रश्न ही हैं उत्तरों में,
प्रश्न ही अभिप्राय है ;
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