Sunday, January 24, 2021

रास्ते वो घूरते हैं, जो चले थे साथ,
अब तो बस उस राह का आयाम रह गया;
 
अरमानों पर किया था तुमने इस कदर कब्ज़ा,
दिल से तो निकले मगर कोहराम रह गया;

​कब ये चाहा था कि बदनामी से हो शोहरत, ​
​बरी हुए इल्ज़ामों से हम, पर नाम रह गया;​

तुम तो कहते थे उतर जाएगा ये नशा,
पर हमारे हाथ अंतिम जाम रह गया;

अब खुली आँखें हैं लेती यादों की करवट,
भूलते कैसे, जब भूल का अंजाम रह गया;

 

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