रास्ते वो घूरते हैं, जो चले थे साथ,
अब तो बस उस राह का आयाम रह गया;
अरमानों पर किया था तुमने इस कदर कब्ज़ा,
दिल से तो निकले मगर कोहराम रह गया;
कब ये चाहा था कि बदनामी से हो शोहरत,
बरी हुए इल्ज़ामों से हम, पर नाम रह गया;
तुम तो कहते थे उतर जाएगा ये नशा,
पर हमारे हाथ अंतिम जाम रह गया;
अब खुली आँखें हैं लेती यादों की करवट,
भूलते कैसे, जब भूल का अंजाम रह गया;
No comments:
Post a Comment