Wednesday, January 20, 2021

जहाँ अक्सर अपेक्षाओं का प्रवास होगा,
वहाँ कब तक ख्वाहिशों का निवास होगा;

कितने ही रोज़ महज़ पानी पर निकले,
और हम ये समझते रहे कि उपवास होगा;

आदतन फिर से हाथ बँध गए अपने,
जैसे डर था कि कोई आसपास होगा;

तुमसे कहने की तारीख मुक़र्रर की थी,
कब ये जाना था कि सफर में अवकाश होगा;

यही सोच सजाते रहे, लफ़्ज़ हम करीने से,
गज़ल हो न हो, लिखने का अभ्यास होगा;
 
सिमट गयी है कहानी दो ही पन्नों में,
और सब सोच रहे थे कि उपन्यास होगा;

इस चौखट को लगाते हुए कहाँ सोचा था,
कि जल्द ही इसी दरवाज़े से निकास होगा;

 

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