वो हवा फिर लौट के घर जा न सकी,
जो इक जलता चराग बुझा न सकी;
उस चराग की लौ में पढ़ रहा था बच्चा,
चाह कर भी उसे वहाँ से हटा न सकी;
सिल रही थी उस उजाले में फटी चादर,
वह माँ जो कभी सर को झुका न सकी;
हिम्मत उनकी देख कर विषमताओं में,
हवा खुद का वेग ज़रा भी बढ़ा न सकी;
मोड़ लिया रुख हौसलों की कदर् में,
उस हवा ने जो कभी शरमा न सकी;
क्या कहेगी लोग पूछेंगे नतीजा,
इसलिए वह लौट के घर जा न सकी;
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