यादों के लिहाफ़ में जाड़ा कम न हुआ,
ओस में भीगते रहे, ज़ुदा ग़म न हुआ;
इसी आस में कि जियेंगे कभी अपने लिए,
हमने रुतबे भी सहे, घूँट गरल के पिए;
यूँ तो महफ़िलों में शामिल हम भरपूर हुए,
जितना सब से मिले उतना खुद से दूर हुए,
अब फ़क़त एक ख़्वाहिश रह गयी दिल में,
भूल न जाऊं स्वयं को अब मैं मुश्किल में;
खुद की खुद से ही बहुत मज़बूरियाँ रहीं,
शायद इसलिए जीवन भर ऐसी दूरियाँ रहीं।
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