Friday, January 29, 2021

 

गरीबी लिखी, बेबसी लिखी,
लिखी तड़प, मायूसी लिखी,
लिखा दरिंदगी पर, अत्याचार पर,
समाज का बौनापन, व्यभिचार पर,
कुपोषण पर, विरोधी अधिवेशन पर,
नाकाबिल सरकार पर, शोषण पर,
बीमारी पर, और बेरोज़गारी पर,
पर क्यों नहीं लिखते कुछ सदाचारी पर,
काँटों की गलियों में पुष्प के व्यापारी पर,
क्यों नहीं लिखते वात्सल्य पर, करुणा पर,
या खुद को समर्पित करती वरुणा पर,
अमृत दोहन पर, प्रेम सम्मोहन पर,
कुछ तो लिखो मोहन पर,
कभी शाबाश भी लिखो, उल्लास लिखो,
कभी अभिलाश, कभी पलाश लिखो,
चलो कुछ हर्ष लिखो, ख़ुशी की लहर लिखो,
​कब तक लिखोगे रात, अब कुछ सहर लिखो। ​

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