Tuesday, December 1, 2020

ढेर सारी नमी सहेज ह्रदय में,​
और कुछ आँचल में,
वह रही रिसती पूरी बरसात,
न कोई उलाहना, न संताप,
न अपनी तक़दीर पर पश्चाताप,
बस अपनी सीलन को,
वह सहती रही चुपचाप,
शायद यह सोचकर,
कि कमी रह गयी कहीं जुड़ाव में,
जब छत से उसका हुआ था मिलाप,
वो छत जो है उसके सर पर सवार,
ये घर की दक्खिनी दीवार।

बरसात रुकी पर रह गयी सीलन,
बहुत दिनों तक,
फिर धूप ने सेंका उसे,
पपड़ियाँ पर गयीं दीवार पर,
उखड़ गए सब रंग,
वह अब भी न बोली कुछ,
फिर हमने छत की मरम्मत कराई,
कुछ और सुखाया दीवार के आँचल को,
और रंग दिया फिर नया सा।

अब भी मौन है दीवार,
पहले जैसी ही नयी हो गयी है,
अब आँचल में नमी नहीं दिखती,
पर वह नमी जो ह्रदय में थी उसके,
कहाँ सुखा पायी उसे धूप भी,
वह अब भी है उसके अंदर,
उसकी अपनी सीलन,
उसे रखना चाहती है वो,
किसी निशानी की तरह,
जिस तरह रख लेते हैं हम,
बुरे समय को सहेज कर,
अपनी दक्खिनी दीवार में।

 

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