दरख़्त बोलते नहीं,
डोलते हैं तूफानों में,
झोंक देते हैं,
अपना सारा लचीलापन,
कि खड़े रह सकें,
तूफानों के बाद भी ...
खड़े रहते हैं निश्चल,
भीषण ऊष्मा में,
सोख कर अपने ही पसीने को,
और देखते हैं उपयोग,
अपनी छाया का,
चुपचाप......
उजड़ते रहते हैं पत्तियों से,
फिर संवरते हैं,
अनवरत, साल दर साल,
लगाते हैं गले,
बारिश, शीत सब.....
पर इस सब के लिए,
बढ़ना होता है उन्हें,
जमीन के ऊपर,
जमीन के भीतर,
निरंतर.......
कैसे कर पाते हैं,
ये सब,
दरख्त जो बोलते नहीं,
समझो कभी उनकी भी भाषा,
किन्हीं चुप्पियों में,
फिर करो कोशिश,
दरख़्त बनो,
तूफ़ान तो सब हैं।
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