एक से हैं ये दिन, एक सी रात हैं,
तुम ये कैसे समय संकुचित कर गए;
बंद बाज़ार, सड़कें भी सूनी रहीं,
खुद चमन भी दशा देख हैरान थे,
हमने कमरों की नापी ज़मीं रोज़ ही,
घर से निकले नहीं थे, परेशान थे,
हमने फैलाये पर थे गगन में सदा,
तुम ये कैसे हमें संतुलित कर गए;
जिन ख्यालों को हम थे संजोये हुए,
वो हकीकत की इक दास्ताँ कह गए,
हाथ को हमने साबुन से धोया बहुत,
दिल में जो झाग थे, जस के तस रह गए;
राज़ जो थे छिपे राज़ ही रह गए,
तुम हमारा ह्रदय ही भ्रमित कर गए;
कुछ गगन की तरंगें भी अनजान थीं,
कुछ धरा को थे हम भी बढ़ाये हुए,
बात करते भी कैसे इस आवाज़ में,
हमने मुख पर थे कपड़े चढ़ाये हुए ;
मौन ही मौन में हमने सब कुछ कहा,
तुम भाषाओं को, संगठित कर गए ;
भूल बैठे मिलन की हैं रंगीनियां,
है ये ख्वाहिश कि फिर रूबरू बात हो,
अबकी तम जो हटे तो रहे रौशनी,
अबकी फिर से न ऐसी घनी रात हो,
अब तो आशाओं की बाट जोहेंगे हम,
तुम ऐसे हमें संक्रमित कर गए।
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