Thursday, May 21, 2020

जैसे जैसे कोरोना के केस देश में बढ़ते जा रहे हैं, वैसे वैसे ही जीवन कुछ कुछ आम होता जा रहा है। अब हम उतनी सतर्कता भी नहीं बरत रहे हैं  जितनी शुरूआती दिनों में बरत रहे थे। अब अर्थव्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गयी है , शायद कहीं ज्यादा। जेबों में कुछ पैसे रहेंगे तो शायद लड़ सकें किसी भी बीमारी से। पर किनकी जेबों में ? खैर ! मुहँ ढंकने से ज़िंदगी तो नहीं ढंकी जा सकती।

घर बैठे ऑफिस का काम करते करते यह एहसास हुआ की वक़्त अब भी सीमित है, पहले की तरह।  घर के काम की अहमियत अब  भी नहीं है, पहले की तरह।  छत की टंकी का पानी अब भी ख़त्म हो जाता है, पहले की तरह।  और कुल मिलकर हम अब भी वहीँ हैं, जहाँ पहले थे, पहले की तरह।

पर कुछ तो बदला है, किसी के लिए तो बदला है।  उनके लिए बदला है जिनके घर के लोग पीड़ित हुए या पीड़ित के इलाज़ में सहयोग कर रहे हैं। उनके लिए बदला है जिनके पैरों में चलते चलते छाले पड़ गए।  उनके लिए बदला है जिनका भविष्य अपने भूतकाल में चला गया है।  कितनी ही कहानियाँ आगे सुनाने के लिए तैयार हो गयी हैं , हो रही हैं। अधिकतर दुखदायी हैं , न तो कोई राजकुमार घोड़े पर बैठ कर किसी को बचाने आता है, न ही कोई मेंढक किसी राजकुमारी के छूने से राजकुमार बनता है।  अलबत्ता लकड़हाड़े की कुल्हाड़ी ज़रूर खो जाती है..... और फिर मिलती नहीं।

बाहर लगे पौधे में रोज एक नया कड़ी पत्ता बढ़ जाता है ; हल्का और मुलायम , पर अपनी निश्चित महक लिए हुए।  ये किसी विश्वास की आशा है....या शायद आशा का विश्वास।

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