एक दिन घर से निकल हम,
राह लम्बी पर चले थे,
थे ये पग छोटे हमारे,
हम भी दीवाने बड़े थे।
पर जो हम निकले अकेले,
सोच कर चलना अकेले,
राह में मिलते रहेंगे,
इल्म न था इतने मेले।
रास्तों की दूरियों में,
कितने ही जन पास आये,
कितनो ने फिर राह बदली,
कितने ही चल साथ आये।
फूल कितनों ने बिखेरे,
कितनों ने काँटे बिछाये,
कितनों ने रोशन किया पथ,
कितनों ने मलहम लगाये।
जो सफ़र तय कर चुके हैं,
उसमें कुछ निश्चित नहीं था,
जो सफ़र अब बच गया है,
उसमें कुछ निश्चित नहीं है।
है ज़िन्दगी लेकिन बताती,
राह सब की तय है निश्चित,
दूरियाँ हों कम या ज्यादा,
इक सफ़र सब का सुनिश्चित।
एक दिन रुक जाएंगे हम,
नींद में सूत जाएंगे हम,
चाहे जितना तब पुकारो,
फिर नहीं चल पाएंगे हम।
तब न कुछ फ़रियाद रखना,
कुछ न दिल में बात रखना,
जो सफ़र थे संग चले हम,
उस सफर को याद रखना।
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