Wednesday, May 6, 2020

याद है उन दिनों जब शहतूत फलते थे,
गिलहरियों को पहले मिल जाते थे,
और हम हाथ मलते थे।
फिर हमने तरीका सीखा,
संतुष्टि को अँजुरियों में रोपना सीखा,
हमने सीखा कि,
गिलहरियों का भी अपना मान है,
और हमारी संतुष्टि में ही,
हमारा सम्मान है,
पर तब हम छोटे थे।

बड़े होते होते सीख लिया हमने,
खुद भी कमाना,
थोड़ा सा खर्च करना,
और बाकी को,
हया की ओट में छिपाना,
सोचा था खर्च करेंगे इसे,
जब आएगा अपना ज़माना,
सच छिपाया, झूठ छिपाया,
छिपाई कुछ बातें खरी,
पता था, नींद में है गिलहरी।

इतना छिपाया की भूल गए,
भूल गए कि कहाँ क्या रख दिया,
कहाँ रख दिया वो जाम जो तब न पिया,
वो आधा लड़कपन जो तब न जिया,
कहाँ रख दी सच की वो सादी कहानी,
कहाँ रख दी झूठी पर थोड़ी जवानी,
कहाँ रख दी कमाई जो की उम्र भर,
कहाँ रख दी शामें, कहाँ रख दी सहर ।

ये जो हम रख कर खर्च करना भूल गए,
ये वो लम्हे थे जो कमाए, पर फ़िज़ूल गए,
एक दिन नींद खुल जायेगी गिलहरी की,
और ढूंढ लेगी वो सारे अखरोट,
छिपा रखें थे जिन्हे,
इसकी ओट....उसकी ओट ।

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