Monday, May 11, 2020

कभी इतना शोर नहीं था कि  कानों को सुनाई ही न पड़े; कभी ऐसा समां भी न था कि आँखों को दिखाई ही न पड़े। दहलीज़ की चौखट पर हथेलियों के निशान उभर आये हैं। किसी का भी तो इंतज़ार नहीं है, फिर वहां क्यूँ बैठे रहे जहाँ पायदान रहा करता था। वह सब जो इतना आसान था कि कभी उस बारे में सोचते भी न थे, अब अपना मुहं बाये खड़ा रहता है। आशंकाओं का दौर धीरे धीरे कोई हादसा बनकर पेशानी पर दिखाई देने लगा है।
सब चुप रहते हैं ; अनमने मन से अनमने से काम अपनी गति से अंजाम पाते रहते हैं। जिन बातों को करने में एक उम्र काम पड़ती थी वो कुछ दिनों में ही हमें खाली कर गयी। ये वक़्त की करवट है या इंसानी गुरुर की पर अब हर दिन का सूरज कुछ खिसियाया हुआ ही निकलता है। 
कहते हैं अब इसी के साथ जीना है, कहते हैं कि बहुत दिनों तक हमारे मुहँ ढके रहेंगे। कहते हैं कि बहुत दिनों तक ख़ामोशी की सांसें किसी कोलाहल का मोहताज़ रहेंगी।

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