Friday, May 15, 2020

आज दूध फट गया ; सुबह की शुरुआत ने ही बता दिया की आज पनीर जैसा कुछ खायेंगे ; हम आसानी से स्वयं को ढाँढस दे देते हैं कि हर छोटी दुर्घटना में एक सुखद घटना छिपी है। यह आम इंसानी प्रवृत्ति है.....कुछ वैसे ही जैसे गर्मी में धुल भरी आंधी चलने पर घर की पुनः सफाई करनी पड़ती है पर हमें संतोष रहता है कि मौसम तो थोड़ा ठंडा हो गया।  आप सोचोगे कि दूध फटने की छोटी सी घटना को इतना तूल क्यों, पर यकीन मानिये, इस लॉकडाउन में दो लीटर दूध आसानी से नहीं आता।  आसानी से तो बस इन दिनों पसीना आता है और कोरोना के समाचार देखते देखते शरीर के अंदर तक सूख जाता है। कभी ध्यान से सोचा न था कि ये खारापन जो बाहर निकल रहा है, ये हमारे अंदर भरा हुआ है।

तीसरे लॉकडाउन की अवधि समाप्त होने को है ; चौथा एक सस्पेंस है जिसे मोदी जी ने पिछले प्रवचन में इसलिए नहीं बताया क्यूंकि उन्हें भी मालूम नहीं था। रोज़ वित्त मंत्री शाम चार बजे आर्थिक पैकेज को समझाती हैं और किसी को समझ नहीं आता ; खुद उन्हें भी नहीं।  किसी भी घोषणा का सबसे अहम् पहलु उसका क्रियान्वयन होता है और यहीं पहुंचकर हमारे राशन कार्ड ऑउटडेटेड हो जाते हैं।  मज़दूरों का पलायन इन सभी घोषणाओं से अनभिज्ञ रहता है ; सड़क की लम्बाई और परिवार की चौड़ाई नापना ही इस समय उनका उद्देश्य है और ज़रूरत भी।   किसी दिन अगर पेट भरा होगा तो पेट ढंकने की भी सोचेंगे ।

कितनी ही आशंकायें घिर आयी हैं जिनका जवाब महज़ अपनी अपनी समझ है ; क्या जीवन फिर वैसा हो पायेगा जैसा था? पर वैसा क्यों चाहते हो ; याद नहीं उस समय इसी जीवन को कितना कोसा करते थे।  कमी अहमियत का एहसास भी है और विज्ञान का आविष्कार भी। सांस लेने के लिए मास्क लगाना भी है और उतारना भी; समय की माँग जीने की लालसा के साथ एक एग्रीमेंट कर चुकी है।  इंसान एडजस्ट कर रहा है।  कभी फिर से वह प्रकृति पर भारी होगा; इतना आसान नहीं है हमें कोई पाठ पढ़ाना ।

कहीं दूर किसी गांव में एक परिवार दो हज़ार किलोमीटर का सफर कर अपने घर पहुँचता है।  हिम्मत अपनों से लिपट कर फफक कर रो पड़ती है।
दालान की कच्ची दीवार पर कुछ आँसुओं के धब्बे कई सालों तक नहीं सूखेंगें ।

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