जब परिन्दा पंख से ही बेखुदी कर ले,
या शमा भी शाम को ही ख़ुदकुशी कर ले,
डूब जाए यदि अमावस से ही पहले चाँद भी,
और ग़म अपने ही दिल से बुज़दिली कर ले,
तब किसी से मिल भी लें तो रूबरू क्या है,
तब ह्रदय में रौशनी की ज़ुस्तज़ू क्या है,
हार हमने मान ली जब खुद की ही खुद से,
तब आरज़ू क्या है, तब गुफ्तगू क्या है
पर अगर हम हौसलों से काम लेंगे पंख का,
और मन में प्रज्जवलित करते रहेंगे ये शमा,
फिर उजाले रात में नहीं चाँद का मोहताज़ होंगे,
दिल्लगी तारों से करके गम करेंगे हम ज़ुदा,
तब किसी से मिल भी लें तो रूबरू सुख है,
तब ह्रदय की रौशनी की ज़ुस्तज़ू सुख है,
हार जो हमने न मानी जब विषम में भी,
तब आरज़ू सुख है, तब गुफ्तगू सुख है
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