Tuesday, August 25, 2020

मेले में कितने झूले हैं,
कुछ को हाथ बढ़ा छू ले हैं,
कुछ की देख अजब सी काया,
अपने हाथ पाँव फूले हैं,

कुछ तेज़ी से ऊपर जाते,
पर फिर लौट धरा को आते,
कोशिश करते रहते हैं पर,
ऊपर ज्यादा टिक न पाते,

कुछ झूले हैं गोल घुमाते,
चक्कर उसपर बहुत हैं आते,
जब वो आखिर में रुक जाता,
उतर देर तक हम पछताते।

कुछ झूले लेकिन सादे हैं,
उनके नहीं बड़े वादे हैं,
उनपर वो चुपचाप बैठते,
जिनके पास सिर्फ यादें हैं।

हर झूले की अपनी मति है,
पर कुछ से अपनी सहमति है,
समझा झूलों के अनुभव से,
हर झूले की अपनी गति है।

सबकी है नाव तलैया में,
अंतर है महज़ रवैया में,
चला गया कोई छला गया,
मेलों की भूल भुलैया में। 

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