वक़्त से थी कामनायें,
थी बहुत सी योजनायें,
वक़्त खुद ही रूठ बैठा,
वक़्त को कैसे मनायें।
चुक गयी बातें हमारी,
जो इकट्ठी की थीं सारी,
अब नहीं है भोर आती,
है पलक पर रात भारी।
ये नज़ारे वो नहीं हैं,
ये फुहारें वो नहीं हैं,
कैद है बूंदों में सावन,
ये बहारें वो नहीं हैं।
अब नहीं कोई कसर है,
इन दिनों हम बेअसर हैं,
इन दिनों हम बेअसर हैं,
अब सही से है ये जाना,
बेअसर में भी बसर है।
आज कुछ ज़िद्द पर अड़ी है,
पर ये केवल इक घड़ी है,
वक़्त ने ही था बताया,
ज़िंदगी कितनी बड़ी है।
आज बेशक दिवस खाली,
पर जगेगा जल्द माली,
जब नए प्राची के पट पर,
फिर दिखाई देगी लाली।
No comments:
Post a Comment