Wednesday, August 24, 2011

छोड़ो अब चिंता दर्पण क़ी

अब भी विश्वास नहीं होता,
कि इतने वर्ष व्यतीत हो गए,
कल तक जो तुतली लोरी थे,
आज सुनहरे गीत हो गए;

अब भी संचार करे सावन,
अब भी एहसास करे है तन,
पाया हमने चाहे जितना,
अब भी कुछ आस करे है मन;

छोड़ो अब चिंता दर्पण क़ी,
या हाथ छोड़ते यौवन क़ी,
घटते या उजले केशों क़ी,
छोड़ो अब चिंता भेषों क़ी;

अब व्यर्थ न हाहाकार करो,
बस मन का अपने श्रृंगार करो,
तुम अब भी वही धुरंधर हो,
बस इस जीवन से प्यार करो...

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