ये जो उधड़े हुए धागे ज़मीं पर फैले हैं,
उस पुरानी चादर की बूढी कतरने हैं,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें हैं,
सफ़ेद बाल हैं, झुर्रियों में सिमटे लम्हे हैं,
अब तो बस लटकी चादर धागों को गिरते देखती है,
अब इन धागों को इकट्ठा करने से सुबह नहीं बनती ....
उस पुरानी चादर की बूढी कतरने हैं,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें हैं,
सफ़ेद बाल हैं, झुर्रियों में सिमटे लम्हे हैं,
अब तो बस लटकी चादर धागों को गिरते देखती है,
अब इन धागों को इकट्ठा करने से सुबह नहीं बनती ....
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