बड़ी शिद्दत से इनकी आवाजाही रंग लायी है,
किसी का न तिलक और न कहीं कोई सगाई है,
सफ़ाई रोज़ होती है, हठी ये गिर कर पलती है,
मगर फिर भी दीवारों पर मेरे चुपचाप चलती है,
मकड़ियाँ हैं दिलों की ये, दिलों की बात सुनती हैं,
मेरे कमरे के कोनों पर अभी भी ज़ाले बुनती हैं
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