महज़ इक आरज़ू हो तुम या मेरे पेड़ बरगद के,
झूला मेरे सावन का हो या हो तुम मेघ अम्बर के,
कुँए का नीर हो लू में या ठंडी ओस खेतों की,
महुआ हो मेरे बागों का या टहनी एक पतझड़ की,
करवटी हैं सब बदल जाते हैं मौसम में,
मैं क्यों सोचूं की तुम भी उन्ही के दायरे में हो,
अंधेरों में जो गुजरी थी प्रकाशित अब वो रातें हैं,
दिवस तुम मेरे पश्चिम के मेरी रातों के सूरज हो.
झूला मेरे सावन का हो या हो तुम मेघ अम्बर के,
कुँए का नीर हो लू में या ठंडी ओस खेतों की,
महुआ हो मेरे बागों का या टहनी एक पतझड़ की,
करवटी हैं सब बदल जाते हैं मौसम में,
मैं क्यों सोचूं की तुम भी उन्ही के दायरे में हो,
अंधेरों में जो गुजरी थी प्रकाशित अब वो रातें हैं,
दिवस तुम मेरे पश्चिम के मेरी रातों के सूरज हो.
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